ओ! मस्तक विराट!
अभी नहीं मुकुट,
अभी नहीं अलंकार!
अभी नहीं तिलक,
अभी नहीं राज्य-भार!
एक दिन माथे मेरे,
सूर्य होगा उदीय,
इतना पर्याप्त मुझे अभी!
-कुंअर नारायण सिंह
"एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर."
-मर्लिन ब्रांडो
Monday, 22 February 2010
तुम हो, तो हूँ, मैं.
तुम हो, तो हूँ, मैं याद में तुम हो सुख-दुःख में तुम हो. दूर होकर भी पास हो तुम एहसास है मुझे अपने फासलों का गमो का भी, हैसियत का भी. पर क्या करूँ, एक लम्बा, ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार है. तुम हो, तो हूँ, मैं.
अच्छी कविता
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