सारी प्रगति के बाद भी भारतीय समाज महिलाओं के प्रति दिनों दिन क्रूर और असहिष्णु होता जा रहा है। कहने को तो हम नारी को देवी का दर्जा देते हैं पर व्यवहार ढोरों के समान करते हैं। कहां है हमारी 5 हजार वर्ष पुरानी संस्कृति और सभ्यता। सड़कों पर तो भिखारी, कचरा, थूकते हुए लोग और कचौरी समोसा में पूरी दुनिया की समस्याएं हल करते लोग। यही है मेरा भारत महान। मकतूब
ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Monday, 14 February 2011
यही है मेरा भारत महान
सारी प्रगति के बाद भी भारतीय समाज महिलाओं के प्रति दिनों दिन क्रूर और असहिष्णु होता जा रहा है। कहने को तो हम नारी को देवी का दर्जा देते हैं पर व्यवहार ढोरों के समान करते हैं। कहां है हमारी 5 हजार वर्ष पुरानी संस्कृति और सभ्यता। सड़कों पर तो भिखारी, कचरा, थूकते हुए लोग और कचौरी समोसा में पूरी दुनिया की समस्याएं हल करते लोग। यही है मेरा भारत महान। मकतूब
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