Thursday, 17 December 2009

जीवन नाम है नित नयेपन का

जीवन नाम है नित नयेपन का.
स्फूर्ति, ऊर्जा, सकारात्मक सोच का मिश्रण ही जीवन को सुन्दर बनता है.
किसी क्रिएटिव इंसान के लिए ज़रूरी है कि वो अपने ऊपर संतुष्टि कि जंग कभी न लगने दे.
2009 समाप्त होने को है तो मैने 2010 के लिए नया कुछ करने की सोची है.
बांग्ला और मराठी में पाठ परम्परा काफी पहले से उपस्थित है.
बांग्ला में तो नाटकों का पाठ सुनने का भी टिकट खरीदकर लोग आते है.
लेकिन हिंदी में पाठ का अर्थ कवि सम्मलेन है जहाँ कुछ लोग अपनी कविताये पढ़ते है.
दरअसल शब्दों की मूल ध्वनि को पकड़ना, ध्वनि में छिपे अर्थ को उदघटित करना और
व्याख्यात्मक बिम्ब उत्पन्न करना, ये सब पाठ परंपरा की अनुस्युत और छिपे संस्पर्श है.
शब्दों का सही उच्चारण हमें उसमे छुपे भावनात्मक आवेग Emotional Force को पकड़ने में मदद करता है.
और रचना का सही पाठ एक निश्चित देह्गति और देहभाषा को भी प्रकट करता है.
 चेहरे का सही भाव,भाषा,देह्गति मिलकर एक पूर्ण अर्थ को प्रकट ही नहीं करते वरन संप्रेषित भी करते है.
यह पूर्ण व्यक्तित्व निर्माण है..

इसीलिए सोचा प्रत्येक शनिवार में कुछ निश्चित श्रोता, दर्शक के सामने हिंदी में कविता, कहानी,नाट्य गीत, नाट्य संवाद पर पाठ प्रस्तुत करूं.
युवा पीढ़ी के लिए यह साहित्य, नाटक, कविता से साक्षात्कार के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास से भी इसे जोड़ा जाएगा..
राकेश दीक्षित,राजेंद्र कोठारी और मैंने एक दोपहर new market कॉफ़ी हाउस में बैठकर
भोपाल नगर निगम की चुनाव चर्चा के बीच यह तय किया कि
भोपाल में जितने प्राइवेट शिक्षा संस्थान है उनके विद्यार्थियों को भी इसमें शामिल किया जाए..
कला जगत कि विशेषकर हिंदीभाषी पट्टी कि यह समस्या हमेशा रही है कि
दूसरो से संवाद न कर अपनी ही दुनिया में उलझे रहते है ..
समाज-समाज कि बातें तो बहुत करते है परन्तु समाज से जुड़ते कितना है..
 नए दर्शक भी हम नहीं तलाशते बस जो भारत भवन, रवींद्र भवन आता है वही हमारा दर्शक है..
क्योकि नहीं रंगमंच समाज के हर कोने तक पहुँचता हैं ,यह अपने श्रेष्ठ होने के अहंकार मैं मेंढक सा कुए में घुसे रहता है..
और दिखने वाले आसमान को ही अपनी दुनिया मानता समझता है..

होश मैं रहकर गाफिल रहना कोई हम रंगकर्मियों से सीखे
हम युवा पीढ़ी को संस्कारित करने और कलाक्षेत्र में लाने के लिए क्या कर रहे है ..

फिल्म और टेलीविजन ने थियेटर को ख़त्म कर दिया है.
दर्शक छीन लिए ऐसी घोषणा करने से रंगमंच का कोई भला नहीं होने वाला.
अच्छी फिल्म और टीवी के सामने हमारी तैयारी क्या है.
नए दर्शक आयें और नियमित रूप से जुड़े. ऐसी कौन सी योजना या ब्लू प्रिंट रंगकर्मियों के पास है.
प्रडक्शन ग्रांट से नाटक कर लेने से खुद का बायोडाटा ज़रूर बनता है
पर युवा रंगकर्मी के लिए शोध, प्रशिक्षण, पुस्तकालय, पत्रिका, डायरेक्ट्री
जैसी सुविधाओ के लिए हमेशा सरकारी मदद या ग्रांट कि अपेक्षा होती है.
पर स्वयं कि कार्यप्रणाली क्या हो यह भी विचारनीय है.
बहरहाल 15 दिसंबर वैशाली काम्प्लेक्स शाम 6.30 पर आये
आपको निराला, मुक्तिबोध, बच्चन, रघुवीर सहाय और अज्ञेय कि कविताओं का रसास्वाद मिलेगा.

परिपत्र में

दोस्त आलोक
10.29AM

Sunday, 13 December 2009

बच्चों, तुम कितने समझदार हो

बच्चों, तुम कितने समझदार हो
कितने प्यारे हो

तुम बच्चों ने Sound of Music में रंग भरे
भगत कि गत बनाई
बच्चों तुमने एम्फी थियेटर में
कला के सच्चे रंग बिखेरे

Recorded Track पर तुमने
अभिनय किया यूँ,
कि पारंगत अभिनेता भी
चकरा जाये
चकमा खा जाये

बच्चों तुम्हारा आभारी हूँ
हमेशा के लिए
मेरे जीवन में यूँ ही बने रहना
संस्कार वैली के बच्चों
तुम्हारा जीवन शुभ हो

तुम खुशियों के आसमान नापों
सृजन के नए शिखर छुओ
सच्चे उत्तराधिकारी बनो
भारतीय मानव समाज के

शुभकामनाओ के साथ
तुम्हारा आलोक अंकल

हजारों जिंदगियां खामोश




आज 3 दिसंबर 2009  है. आज से ठीक पच्चीस वर्ष पहले भोपाल में विश्व कि अब तक कि सबसे भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई थी. यूनियन कार्बाइड कि फैक्ट्री से निकली ज़हरीली गैस ने हजारों ज़िन्दीगियों को खामोश कर दिया तो हजारों ऐसे भी है जो जिंदा तो है पर लाश कि तरह. उस वक़्त जो बच्चे दुनिया में आने को थे वह तरह - तरह कि बीमारियों का घर बन गए. हर बरसी पर मोमबत्ती जलना, मशाल प्रदर्शन और दो दिन चर्चा यही बचा रहा है. आज तक सच्चे हकदारों को मुआवजा नहीं मिला या न के बराबर मिला, वही प्रभावशाली लोगों ने तिगुना तक बना लिए. दवाओ के लिए तरसते बदहाल, बीमार आज भी बैंक में भटकते है और उनके लिए आई दवाइयां भी उन्हें न मिलकर कहीं और बिक जाती है. भोपाल कि चमचमाहट, विकास के पीछे एक चेहरा ये भी है.
बड़े व्यवसायी घरानों को इस बारे में कुछ ठोस कर दिखाना चाहिए. समाज में ही तो व्यवसाय है. समाज उन्नत, खुशहाल, स्वस्थ नहीं रहेगा तो अंततः इसकी क्रय शक्ति पर भी असर पड़ेगा जो अंततः आर्थिक रूप से समृद्ध कार्पोरेट घरानों को चुकाना होगा. अतः बेहतर है कि उत्पाद पर होने वाले प्रमोशनल खर्च को कम कर उसका एक अंश भोपाल के वास्तविक गैस पीड़ितों और परिजनों को मिले यही उनके प्रति हमारी सच्ची विनम्र श्रृद्धांजलि होगी और उनके जीवित परिजनों को मानवीय सहायता भी.

इसी आशा के साथ.
दोस्त आलोक





जीवन में पूरा अंधकार नहीं होता



जीवन में पूरा अंधकार नहीं होता. आशा और उम्मीद कि एक लौ जगी रहती है. बुरी से बुरी स्थितियों में भी कोई एक क्षण घटित होता है और पता नहीं कहाँ से, कैसे, किससे मदद मिल जाती है. काम हो जाता है. तब प्रकृति कि उदारता और ईश्वर का महत्व समझ आता है. आज में यह मानता हूँ कि एक एक्टर को एक अच्चा खिलाड़ी, रसोइया, वैज्ञानिक समझ वाला एवं अध्यात्मिक चेतना वाला व्यक्ति होना चाहिए. रसोइया विभिन्न मसालों को अलग अनुपातों से मिलकर, काटकर, भुनकर, तलकर स्वादिष्ट व्यंजन बनता है तो वैज्ञानिक अपनी तर्क बुद्धि और विश्लेषण से जीवन को गतिमान, सुविधाजनक, प्रगतिशील बनता है. खिलाडी एक अदभुत मानवीय जीवटता से भरा हुआ होता है जो अपनी लय, क्षमता को स्फूर्ति से जोड़कर उसे टीम वर्क में बदल देता है और सामूहिक प्रयासों में भी एकल प्रयास अलग दिख भी जाता है. वैसे ही एक अभिनेता आलेख से चरित्र को छांटकर, चिन्तन, विश्लेषण करता उसे दूसरों के साथ टीम वर्क में बदलकर अलग-अलग मनोभावों को मनोवैज्ञानिक सत्य और मानवीय व्यवहार, प्रतिक्रियाओं से भरकर एक जटिल आवेगपूर्ण ओजस्वी सृजनात्मक क्षण मंच पर रचना है जिसे हम अच्छा अभिनय कहते है.
अध्यात्म एक निरंतर व्यक्तित्व अंतर्क्रिया है जो व्यक्ति को मनुष्यत्व, इंसानियत से जोडती है. इससे व्यक्ति के रूप में अभिनेता का निखर ओर उभर कर आता है ओर वह एक इन्सान के रूप में मनुष्य समाज, जीवन दर्शन के बेहतर ढंग से जोड़कर समझ पाता है एवं जीवन आचरण में आत्मसात करने कि कोशिश करता है.

Wednesday, 2 December 2009

लियो तोल्स्तोय की कहानियाँ: "धर्मपुत्र" एवं "प्रेम में ईश्वर"!

एक दिसंबर को लियो तोल्स्तोय की दो कहानियों  "धर्मपुत्र" एवं "प्रेम में ईश्वर" का मंचन भारतीय रंगमंच पर पहली बार "दोस्त" ने कला अकादमी, भोपाल में किया|

             ऐसी सरल मानवीय एवं करुणात्प्रेरक कहानियों से मेरा पहली बार सामना हुआ| हालाँकि इससे पहले विभिन्न रचनाकारों की सौ से ऊपर कहानियाँ मैं पूर्व में भी कर चुका हूँ; लेकिन जीवन की छोटी घटनाओं से गहन सत्य की खोज, मानवीय व्यवहार में ही ईश्वर का साक्षात्कार प्रतिक्षण प्रेम द्वारा करना; इनको मंच पर प्रस्तुत करना एक चुनौती थी| परन्तु दर्शकों ने भावविभोर होकर प्रस्तुति देखी एवं स्वयं को कहानियों में महसूस करते हुए अपनी जीवन कहानी को उसमें देखा; अनुभूत किया; ये बड़ी बात है| दर्शक कम थे परन्तु दुनिया में समझदार कम ही होते हैं और इससे उनका महत्त्व भी समझ आता है| दर्शकों में पत्रकार, विद्यार्थी, शिक्षक, घरेलू लोग और रंगमंच से जुड़े लोग थे और आश्चर्य यह कि मंच पर उपस्थित कलाकारों का प्रतिनिधित्व भी इन्हीं वर्गों द्वारा हो रहा था| कारंतजी कहते थे- रंगमंच सामूहिक तो है ही सामुदायिक भी यानी कम्युनिटी ओरिएंटेड भी होता है और इसी में रंगमंच की ऊर्जा और चेतना निहित है| समय: १०:४७ प्रात: |
दोस्त आलोक