Sunday, 13 December 2009

जीवन में पूरा अंधकार नहीं होता



जीवन में पूरा अंधकार नहीं होता. आशा और उम्मीद कि एक लौ जगी रहती है. बुरी से बुरी स्थितियों में भी कोई एक क्षण घटित होता है और पता नहीं कहाँ से, कैसे, किससे मदद मिल जाती है. काम हो जाता है. तब प्रकृति कि उदारता और ईश्वर का महत्व समझ आता है. आज में यह मानता हूँ कि एक एक्टर को एक अच्चा खिलाड़ी, रसोइया, वैज्ञानिक समझ वाला एवं अध्यात्मिक चेतना वाला व्यक्ति होना चाहिए. रसोइया विभिन्न मसालों को अलग अनुपातों से मिलकर, काटकर, भुनकर, तलकर स्वादिष्ट व्यंजन बनता है तो वैज्ञानिक अपनी तर्क बुद्धि और विश्लेषण से जीवन को गतिमान, सुविधाजनक, प्रगतिशील बनता है. खिलाडी एक अदभुत मानवीय जीवटता से भरा हुआ होता है जो अपनी लय, क्षमता को स्फूर्ति से जोड़कर उसे टीम वर्क में बदल देता है और सामूहिक प्रयासों में भी एकल प्रयास अलग दिख भी जाता है. वैसे ही एक अभिनेता आलेख से चरित्र को छांटकर, चिन्तन, विश्लेषण करता उसे दूसरों के साथ टीम वर्क में बदलकर अलग-अलग मनोभावों को मनोवैज्ञानिक सत्य और मानवीय व्यवहार, प्रतिक्रियाओं से भरकर एक जटिल आवेगपूर्ण ओजस्वी सृजनात्मक क्षण मंच पर रचना है जिसे हम अच्छा अभिनय कहते है.
अध्यात्म एक निरंतर व्यक्तित्व अंतर्क्रिया है जो व्यक्ति को मनुष्यत्व, इंसानियत से जोडती है. इससे व्यक्ति के रूप में अभिनेता का निखर ओर उभर कर आता है ओर वह एक इन्सान के रूप में मनुष्य समाज, जीवन दर्शन के बेहतर ढंग से जोड़कर समझ पाता है एवं जीवन आचरण में आत्मसात करने कि कोशिश करता है.

No comments:

Post a Comment