एक दिसंबर को लियो तोल्स्तोय की दो कहानियों "धर्मपुत्र" एवं "प्रेम में ईश्वर" का मंचन भारतीय रंगमंच पर पहली बार "दोस्त" ने कला अकादमी, भोपाल में किया|
ऐसी सरल मानवीय एवं करुणात्प्रेरक कहानियों से मेरा पहली बार सामना हुआ| हालाँकि इससे पहले विभिन्न रचनाकारों की सौ से ऊपर कहानियाँ मैं पूर्व में भी कर चुका हूँ; लेकिन जीवन की छोटी घटनाओं से गहन सत्य की खोज, मानवीय व्यवहार में ही ईश्वर का साक्षात्कार प्रतिक्षण प्रेम द्वारा करना; इनको मंच पर प्रस्तुत करना एक चुनौती थी| परन्तु दर्शकों ने भावविभोर होकर प्रस्तुति देखी एवं स्वयं को कहानियों में महसूस करते हुए अपनी जीवन कहानी को उसमें देखा; अनुभूत किया; ये बड़ी बात है| दर्शक कम थे परन्तु दुनिया में समझदार कम ही होते हैं और इससे उनका महत्त्व भी समझ आता है| दर्शकों में पत्रकार, विद्यार्थी, शिक्षक, घरेलू लोग और रंगमंच से जुड़े लोग थे और आश्चर्य यह कि मंच पर उपस्थित कलाकारों का प्रतिनिधित्व भी इन्हीं वर्गों द्वारा हो रहा था| कारंतजी कहते थे- रंगमंच सामूहिक तो है ही सामुदायिक भी यानी कम्युनिटी ओरिएंटेड भी होता है और इसी में रंगमंच की ऊर्जा और चेतना निहित है| समय: १०:४७ प्रात: |
दोस्त आलोक

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