आज 3 दिसंबर 2009 है. आज से ठीक पच्चीस वर्ष पहले भोपाल में विश्व कि अब तक कि सबसे भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई थी. यूनियन कार्बाइड कि फैक्ट्री से निकली ज़हरीली गैस ने हजारों ज़िन्दीगियों को खामोश कर दिया तो हजारों ऐसे भी है जो जिंदा तो है पर लाश कि तरह. उस वक़्त जो बच्चे दुनिया में आने को थे वह तरह - तरह कि बीमारियों का घर बन गए. हर बरसी पर मोमबत्ती जलना, मशाल प्रदर्शन और दो दिन चर्चा यही बचा रहा है. आज तक सच्चे हकदारों को मुआवजा नहीं मिला या न के बराबर मिला, वही प्रभावशाली लोगों ने तिगुना तक बना लिए. दवाओ के लिए तरसते बदहाल, बीमार आज भी बैंक में भटकते है और उनके लिए आई दवाइयां भी उन्हें न मिलकर कहीं और बिक जाती है. भोपाल कि चमचमाहट, विकास के पीछे एक चेहरा ये भी है.
बड़े व्यवसायी घरानों को इस बारे में कुछ ठोस कर दिखाना चाहिए. समाज में ही तो व्यवसाय है. समाज उन्नत, खुशहाल, स्वस्थ नहीं रहेगा तो अंततः इसकी क्रय शक्ति पर भी असर पड़ेगा जो अंततः आर्थिक रूप से समृद्ध कार्पोरेट घरानों को चुकाना होगा. अतः बेहतर है कि उत्पाद पर होने वाले प्रमोशनल खर्च को कम कर उसका एक अंश भोपाल के वास्तविक गैस पीड़ितों और परिजनों को मिले यही उनके प्रति हमारी सच्ची विनम्र श्रृद्धांजलि होगी और उनके जीवित परिजनों को मानवीय सहायता भी.
इसी आशा के साथ.
दोस्त आलोक
Dada Apko mera Pranaam. kafi acha laga aapko blogger main dekhke....apke blog ke sari batain main roz padta hun......apke swastha tatha subhkamnaoye ke sath. Parth Roy
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