Friday, 6 August 2010

कहाँ हो तुम?

कहाँ हो तुम?
कहीं से भी नहीं आती ध्वनि तुम्हारी,
कोई संपर्क नहीं
तुम्हारा चेहरा कैसा दीखता होगा अभी,
मेरी स्मृतियों में सब धुंधलाता जा रहा है,
बची हैं शेष,
मात्र बचपन, किशोरावस्था की स्मृतियाँ!
यौवन की दहलीज़ पर क़दम रखते तुम
बहुत आकर्षक थे,
विवाह और पिता बनने के बाद
मुझे तो कम-से-कम तुम ग्रेसफुल लगते थे
पर अभी इस वक़्त कैसे हो तुम?
कोई ध्वनि भी नहीं,
मात्र मौन भयानक-सा
मेरे साथी, दोस्त, बड़े भाई, गौतम दादा!
कहाँ हो तुम?

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