ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Friday, 6 August 2010
पर, माँ, माँ होती है!
दुनिया के लोग खरबों हैं,
उतनी ही भावनाएँ, विचार, द्वंद्व,
उतना है संघर्ष, सफलता-असफलता भी,
एक से दूसरे होते ही हम, भीतर से बदल जाते हैं,
पर दुनिया में, एक चीज़ ऐसी भी है,
जो कभी नहीं बदलती!
जानवरों को देखा, इंसानों को भी,
पशु-पक्षियों को भी,
पर एक समान है सभी जगह,
माँ का व्यवहार!
अपने बच्चे को दूध पिलाती!
चोंच से दाना चुगाती!
जीभ से चाटकर प्यार से सहलाती!
अपने पैरों के बीच, सुरक्षित रखती बच्चे को,
गोद लिए बच्चे को,
संकट के कारण छटपटाती,
अपनी संतान के लिए,
उसके सुखद जीवन-भविष्य की कामना,
निस्वार्थ भाव से करती|
वो माँ होती है-चाहे किसी की भी हो
कहीं भी हो, कैसी भी हो संतान!
पर, माँ, माँ होती है!
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