हम सब कितना दूर होते हैं,
जब सबसे निकट-पास होते हैं|
पाने का अर्थ,
खोने के अहसास के बाद आता है|
बहुत शोर के बाद, खामोशी,
अपनी बात भी कह जाती है चुपचाप|
चुप होकर भी हम कितना बोल जाते हैं|
देखकर भी नहीं देखते,
और देखकर, देखने में ही खो जाते हैं,
पर देखते सचमुच फिर भी नहीं|
कुछ ऐसा ही है, हाल यार!
अपना और दुनिया दोनों का,
और दोनों को ही गुमाँ है, और यकीन भी
खुद के समझदार होने का!!
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