ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Sunday, 29 August 2010
कलाओं का घर भारत भवन!
कहने को तो भोपाल में कलाओं का घर भारत भवन है, परन्तु अब लगता है यहाँ की कलाएँ तो पता नहीं कहाँ हैं या गयीं घर एक सुनहरे अतीत की भुतहा याद लिए अवशेष के रूप में बचा है| आज की युवा पीढ़ी और दर्शकों को यह जानकार शायद किंचित आश्चर्य हो की पच्चीस साल पहले जब भोपाल बहुत छोटा शहर था] शहर के इने-गिने रंग समूह थे और शायद तीन अखब़ार जिनमें कोई कला समीक्षक भी नहीं होता था, न ही प्रत्येक प्रस्तुति की रंगीन तस्वीर छपती थी, तब भी भारत भवन में एक साथ एक समय तीन नाटकों के मंचन का प्रयोग किया गया और तीनों प्रदर्शन अन्तरंग, तलरंग और बहिरंग में हाउसफुल थे| यह ध्यान रखने की बात है की प्रत्येक दर्शक टिकिट लेकर ही प्रवेश करता सकता था| यहाँ तक की अभिनेताओं के परिजन भी टिकिट खरीदकर नाटक देखने आते थे| भारत भवन का मंच पाना तब मात्र प्रतिष्ठित कलाकारों के ही बूते की बात थी| यदि उस समय के आमंत्रित कलाकारों की एक सूची बनाई जाये तो उसमें पं. रविशंकर, पं. बिरजू महाराज, केलूचरण महापात्र, पीटर ब्रूक, शंभू मित्रा, असगरी बाई, गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी, पु. ल. देशपांडे, तापस सेन, व्. राममूर्ति, अनंतमूर्ति, गिरीश कर्नाड, अज्ञेय, रघुवर सहाय, तक के नाम मिलेंगे| स्पष्ट है उस समय कला प्रदर्शन के मापदंड क्या थे?
पिछले कुछ वर्षों से भारत भवन एक ऐसी जगह बन गया है जहां कोई भी किराया देकर अन्तरंग में अपना प्रदर्शन करवा सकता है| यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए| लेकिन एक मेरिट तो जीवन के हर क्षेत्र में तय करनी होती है, नहीं तो स्थान की गरिमा भी चली जाती है| आज भारत भवन की केन्टीन में जाकर देखें| जहाँ कभी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों का जमघट लगा रहता था, वहाँ सुबह से ही स्थानीय रंगकर्मी बैठकर गपियाते रहते हैं, यहाँ क्रिएटिव बातें कम, परनिंदा और बेवजह टाँग-खिंचाई ज़्यादा होती है| चूँकि मीडिया के बंधुगण भी कवरेज हेतु भारत भवन नियमित रूप से आते ही हैं सो उनसे मिलने और संपर्क स्थापित करने के लिए भी केन्टीन का प्रयोग होता है| ........... क्रमश:
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