Wednesday, 8 September 2010

अनुभूति!

कितनी भी कोशिशें!
कितने ही प्रयास!!
ढेर सारे प्रयत्न!!
सब वृथा सिद्ध हुए,
जब भी,
मैंने यह कोशिश की थी कि मैं कुछ हूँ,
भीतर से, माँ की कोमल स्नेहिल
लताड़ भरी झिड़की आती-
टूगा! तू बड़ा हो गया है, रे!
और मैं जितना था, उससे और छोटा हो जाता,
आज, देह से अनुपस्थित माँ
फिर कहती है-ख़ुद को छोटा न समझना!
मज़बूत बने रहना!!
और मेरे भीतर एक हिमालय,
आकार लेने लगता है|
                        वो हिमालय, तुम हो माँ!
                        तुम हो, सिर्फ़ तुम हो माँ!
                                         -तेरा आलोक

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