Thursday, 9 September 2010

पिता

सारे दुखों को,
अपनी मुस्कान में छिपा लेते थे, तुम-पिता!
सारे तनाव, तुम्हारे प्रशस्त ललाट पर ग़ायब हो जाते,
सारी परेशानियाँ,
तुम्हारे सिगरेट के धुँए के साथ
कहीं ग़ायब हो जाती थीं
सारी इच्छाओं का केंद्र तुम थे,
सारी कामनाओं की पूर्ति तुम में थी,
सारा ज्ञान, सारी शिक्षा, सारा जीवन-व्यवहार
परोसते थे तुम किसी स्वादिष्ट व्यंजन की तरह
सारी जानकारी, सारी स्थितियाँ तुमसे परिचालित थीं
तुम्हारे बिना, जीवन की कल्पना नहीं थी
तुम्हारे बिना क्या होगा-
यह सोच ही, पाप भरी लगती थी
ईमानदारी के प्रति तुम्हारी प्रतिबद्धता,
रक्त बन, नसों में बही, पिता!
पर, तुम्हारे बाद सारी दुनिया,
एक खोखले बाजे की तरह लगी,
जहाँ सुनने को बहुत-सी ध्वनियाँ हैं
पर, भीतर कुछ नहीं,
जीवन चल रहा है, चलेगा
                                                      पर, तुम आवाज़ देने पर कहाँ आओगे,
                                                      फिर लौटकर मेरे पास, पिता!

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