हमें मध्यप्रदेश का निवासी होने का कितना गर्व है? क्या हम सचमुच अपने प्रदेश, अपनी मिटटी से प्यार करते है? शायद हममे से अधिकांशतः लोग यही कहेंगे की "हाँ है.." परन्तु सवाल यह उठता है की किस बात पर हम गर्व या प्यार करते है? आज के युवाओ से बात करने पर एक निराशाजनक स्थिति उभरती है, वे अपने प्रदेश और इतिहास और परम्परा से परिचित ही नहीं है. जबलपुर के युवा हरिशंकर परसाई और ज्ञानरंजन, रामचंद्र शुक्ल जानते ही नहीं, पढ़ने का सवाल ही कहाँ उठता है. रीवा के लोग नहीं जानते की बीरबल सीधी से रीवा आये थे और रीवा से तानसेन को ग्वालियर रजा ग्वालियर ले आये थे. अधिकांश तो यह भी नहीं पता की शिवमंगल सिंह सुमन उज्जैन रहे और देवास कुमार गन्धर्व की कर्मस्थली थी. प्रसिद्ध नाटककार भवभूति ग्वालियर के पास पवई के थे और भोपाल के कितने युवा शंकर शेष, शरद जोशी और राजेश जोशी को पढ़ते है? बड़ा तालाब किस समय बनाया गया और बेगमों ने नारी शक्ति के रूप में भोपाल की सियासत संभाली. ये विस्तार से युवा नहीं जानते. संस्कृति से जुड़े लोग रोज़ रविद्न्रा भवन में आते है पर यह कब बना, इसका टेक्नीकल ग्राउंड प्लान, स्टेज, लाइट उपकरणों के बारे में उन से पुच कर देखिये तो वे शर्मिंदगी महसूस करेंगे पर बता शायद ही पाए. हमारे यहाँ राष्ट्रीय हिंदी अखबार ही लोग नहीं पढ़ते तो विचार करें कितने लोग अंग्रेजी अखबार पढ़ते होंगे. तो फिर ये प्राइवेट इंजीनियरिंग, पेरामेडिकल कोर्स वाले ढेरो कालेजो में पढ़ने वाले, पढ़ाने वालों का स्तर क्या होगा? शहर के एलिट स्कूलों में भीं छोटे शहरों के बांके लोग पढ़ते-पढ़ाते है तो व्यावसायिक प्रतियोगी परीक्षाओं में हमारा मध्यप्रदेश कहाँ होगा. शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल पब्लिक यूरिनल जैसा है? जहाँ टीचर के घर के बच्चे रोज़ न्यूज़ नहीं सुनते तो फिर बाकि बच्चों का क्या? एक अच्छा कम्युनिटी हाल, एक प्राइवेट प्रेक्षागृह ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा. थूकने, गुटका खाने में अक्सर मिल सकता है. भोपाल मेले में पापड़ , बड़ी, अचार, कपडे, ड्राइगरूम असेसरी मिलेगी पर किताबें, वो भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की, भूल जाइये ये मरीचिका साबित होगी. ट्राफिक सेन्स में महिलाये के साथ सार्वजनिक स्तर पर व्यवहार में हम अभी भी मध्य युगीन ही है और कहते है - हमारा स्वर्णिम मध्यप्रदेश. क्या बात है MP ROCKS
ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Wednesday, 24 February 2010
क्या बात है MP ROCKS
हमें मध्यप्रदेश का निवासी होने का कितना गर्व है? क्या हम सचमुच अपने प्रदेश, अपनी मिटटी से प्यार करते है? शायद हममे से अधिकांशतः लोग यही कहेंगे की "हाँ है.." परन्तु सवाल यह उठता है की किस बात पर हम गर्व या प्यार करते है? आज के युवाओ से बात करने पर एक निराशाजनक स्थिति उभरती है, वे अपने प्रदेश और इतिहास और परम्परा से परिचित ही नहीं है. जबलपुर के युवा हरिशंकर परसाई और ज्ञानरंजन, रामचंद्र शुक्ल जानते ही नहीं, पढ़ने का सवाल ही कहाँ उठता है. रीवा के लोग नहीं जानते की बीरबल सीधी से रीवा आये थे और रीवा से तानसेन को ग्वालियर रजा ग्वालियर ले आये थे. अधिकांश तो यह भी नहीं पता की शिवमंगल सिंह सुमन उज्जैन रहे और देवास कुमार गन्धर्व की कर्मस्थली थी. प्रसिद्ध नाटककार भवभूति ग्वालियर के पास पवई के थे और भोपाल के कितने युवा शंकर शेष, शरद जोशी और राजेश जोशी को पढ़ते है? बड़ा तालाब किस समय बनाया गया और बेगमों ने नारी शक्ति के रूप में भोपाल की सियासत संभाली. ये विस्तार से युवा नहीं जानते. संस्कृति से जुड़े लोग रोज़ रविद्न्रा भवन में आते है पर यह कब बना, इसका टेक्नीकल ग्राउंड प्लान, स्टेज, लाइट उपकरणों के बारे में उन से पुच कर देखिये तो वे शर्मिंदगी महसूस करेंगे पर बता शायद ही पाए. हमारे यहाँ राष्ट्रीय हिंदी अखबार ही लोग नहीं पढ़ते तो विचार करें कितने लोग अंग्रेजी अखबार पढ़ते होंगे. तो फिर ये प्राइवेट इंजीनियरिंग, पेरामेडिकल कोर्स वाले ढेरो कालेजो में पढ़ने वाले, पढ़ाने वालों का स्तर क्या होगा? शहर के एलिट स्कूलों में भीं छोटे शहरों के बांके लोग पढ़ते-पढ़ाते है तो व्यावसायिक प्रतियोगी परीक्षाओं में हमारा मध्यप्रदेश कहाँ होगा. शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल पब्लिक यूरिनल जैसा है? जहाँ टीचर के घर के बच्चे रोज़ न्यूज़ नहीं सुनते तो फिर बाकि बच्चों का क्या? एक अच्छा कम्युनिटी हाल, एक प्राइवेट प्रेक्षागृह ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा. थूकने, गुटका खाने में अक्सर मिल सकता है. भोपाल मेले में पापड़ , बड़ी, अचार, कपडे, ड्राइगरूम असेसरी मिलेगी पर किताबें, वो भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की, भूल जाइये ये मरीचिका साबित होगी. ट्राफिक सेन्स में महिलाये के साथ सार्वजनिक स्तर पर व्यवहार में हम अभी भी मध्य युगीन ही है और कहते है - हमारा स्वर्णिम मध्यप्रदेश. क्या बात है MP ROCKS
Monday, 22 February 2010
तुम हो, तो हूँ, मैं.
तुम हो, तो हूँ, मैं
याद में तुम हो
सुख-दुःख में तुम हो.
दूर होकर भी पास हो तुम
एहसास है मुझे अपने फासलों का
गमो का भी, हैसियत का भी.
पर क्या करूँ, एक लम्बा, ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार है.
तुम हो, तो हूँ, मैं.
याद में तुम हो
सुख-दुःख में तुम हो.
दूर होकर भी पास हो तुम
एहसास है मुझे अपने फासलों का
गमो का भी, हैसियत का भी.
पर क्या करूँ, एक लम्बा, ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार है.
तुम हो, तो हूँ, मैं.
उमंग और उत्साह ही स्रजनात्मक ऊर्जा है.
जनवरी फ़रवरी 2010 बहुत व्यस्त रहा. जनवरी 26 को शहडोल में आजाद का बहुत अच्छा शो हुआ. दर्शक खचाखच थे और नाट्य प्रस्तुति को उन्होंने बहुत उदारता से ग्रहण किया. फिर 30 से 3 तक वर्धा में था. सेवाग्राम नाम से एक टेलीफिल्म बनाई जो गोवा फिल्म फेस्टिवल में जाएगी. फिर 4 फरवरी को उज्जैन में मेरा सम्मान था और ऐसा ही होता है का शो भी. अशोक वाजपेई और पियूष भाई आये थे, अच्छा लगा. 6 फरवरी से ग्रीन वैली स्कूल में काम शुरू किया. और आज २२ फरवरी रविन्द्र भवन में बच्चे आजाद प्रस्तुत कर रहे है. साथ ही ग्रुप में जसमा ओढ़न पर काम शुरी हुआ है. मार्च में उड़ीसा जाना है. मई में लखनऊ बीच में काठमांडू भी जाना है. मेरे सात आर्टिकल छप गए है. उत्साह लग रहा है. उमंग और उत्साह ही स्रजनात्मक ऊर्जा है.
Tuesday, 12 January 2010
कल अवतार फिल्म देखी.मुझे फिल्म कि टेक्नोलोजी और भव्य इफेक्ट के बीच बहती मानवीय संवेदनाओ और भावनाओ के सूक्ष्म मिश्रण ने लगभग चमत्कृत कर दिया .सुना है कि कैमरोन ने 1995 मै इसकी पटकथा का प्रारूप तयार किया था .इससे लगभग सात ड्राफ्ट तैयार हुए ,इतनी विस्मृत पटकथा .सिर्फ बड़े बजट से ही बड़ी फ़िल्मे सार्थक फ़िल्मे नहीं बनती.मानवीय से परे का संसार पेन्डोरा गृह दिखलाने में निर्देशक का अहम् योगदान है .सबसे महत्वपूर्ण है -प्यार ,उससे उपजी ताकत ,और स्वयं को शक्तिमान समझने वालो को योद्धा की भांति धूल चटाना,जीवन धर्म और एक्टिव लाइफ को रेखांकित करता है .अंत में जैक का अवतार के रूप में रह जाना और पंडोरा पर अपने प्यार के साथ एक नया जीवन रूपक रखने को तैयार मानव एक नए रूपाकार में .
सचमुच ही अदभुत फिल्म. मेरी तरफ से रस्सी कलाकारों ,टेकनिसियन,स्टाफ ,निर्देशक और पूरी टीम को असंख्य बधाइयाँ और शुभकामनाये . दोस्त आलोक 11 :08am
सचमुच ही अदभुत फिल्म. मेरी तरफ से रस्सी कलाकारों ,टेकनिसियन,स्टाफ ,निर्देशक और पूरी टीम को असंख्य बधाइयाँ और शुभकामनाये . दोस्त आलोक 11 :08am
चिंता
आज चारों ओर मिडियोक्रेसी इतनी बढ़ गयी है कि समाज का कोई भी पद उससे अछूता नहीं रहा .सबसे दुखद पहलू तो यह है कि समाज के उच्चतम मानकों एवं मूल्यों वाले क्षेत्र पर भी इसकी छाया पड़ रही है.शिक्षा,स्वास्थ्य ,कला ,पत्रकारिता,न्याय ,विधि ,प्रशासन ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जो अपने नैतिकता के उच्च मानदंडो पर खरा उतरता हो.दूसरे दर्जे के और दोयम स्तर के लोगो को इतना अधिक महत्व हर स्तर पर मिलता है कि सच्चे लोग कई बार स्वयं को हतप्रभ पाते है.मिडियोक्रेसी का दायरा इतना बड़ा है और उनकी नेटवर्किंग इतनी अच्छी है कि गूगल का सर्च इंजिन भी शर्मा जाए .कमीशनखोरी आज इतनी है कि उच्च पदों पर बैठे लोगे भी बेशर्मी से अपने उपरवाले का हवाला देते हुए कमीशन मांगते है .सरकारी पैसे का दुरूपयोग देखना हो तो सरकारी संस्थानों को देखिये .जहा बिजली,फ़ोन,चाय,कागच.पेन का एक दिन का खर्चा ही एक परिवार के पेट भरने को काफी होगा.उच्य पदों पर आज काबिल व्यक्ति कम है बल्कि राजसत्ता के गलियारों में घुमने वाले अवसरवादी व्यक्ति अधिक है जो पदों पर बैठकर उनका एवं स्वयं के परिचितों का उद्धार करने मै जुट जाते है.एक अच्छा शिक्षक,एक अच्छा डॉक्टर या इंजिनियर,कलाकार ,पत्रकार ,वकील या कलेक्टर आज कि व्यवस्था में क्या करे , मात्र इतना ही कि वह स्वयं को भ्रस्टाचार मै लिप्त न करके अपना काम ईमानदारी से करे.पर वहा भी उसे प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा.वह दूसरो के लिए लाभप्रद नहीं रहेगा सो उसे परेसान किया जायेगा. एक नई सामाजिक क्रांति ही इसका एकमात्र विकल्प है पर वह क्रांति और परिवर्तन पूर्ण रूप से अहिंसक ,मानवतापूर्ण ,एवं कल्याणकारी होनी चाहिए . दोस्त आलोक 10:55 am bhopal
Sunday, 10 January 2010
कला साधना सम्मान
यानि आज भोपाल में कला परिषद् मुझे कला साधना सम्मान शाम 4 बजे देने वाली है.
थियेटर करने कि चीज़ है
तब समझ आती है ज़िन्दगी
और ज़िन्दगी के मायने...
ईश्वर, माता-पिता और कारन्त बाबा को प्रणाम
आलोक
10.30 AM, BHOPAL
X-MAS
प्रति वर्ष कि भांति आज भी 25 दिसंबर है क्रिसमस का दिन. दुनिया के अरबों ईसाई भाई बहन बच्चों को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाये. करुणावतार क्राइस्ट आज दुनिया में आये थे हमें अहिंसा, इंसानियत, प्यार का सन्देश देने. जात पात, छुआछूत से ऊपर विश्वमानव, विश्वसमाज कि एक वृहद दृष्टि उन्होंने दी थी. ईसा का सन्देश बाद के समय में बुद्ध, महावीर, लाओते, कंफ्युशियन के काल में भी गुंजित हुआ. आज जब पूरी दुनिया वैश्विक आतंकवाद से पीड़ित है, ईसा और भी प्रासंगिक लगते है.
ईसा कि आवश्यकता आज और अधिक लगती है. जिन्होंने स्वयं कष्ट, पीड़ा सही, दूसरों कि खातिर ऐसे त्याग कि मूर्ति को प्रणाम.
दोस्त आलोक
10:15 AM : Dt. 25.12.2009
Bhopal (MP)
ईसा कि आवश्यकता आज और अधिक लगती है. जिन्होंने स्वयं कष्ट, पीड़ा सही, दूसरों कि खातिर ऐसे त्याग कि मूर्ति को प्रणाम.
दोस्त आलोक
10:15 AM : Dt. 25.12.2009
Bhopal (MP)
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