मुम्बई के सारे मित्रों को अनंत चतुर्दशी की शुभकामनाएं, दशहरे के बाद फिर मुलाकात होने वाली है।
ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Tuesday, 21 September 2010
हम सभी भारतीयों को गौरव का अनुभव करना चाहिए, क्योंकि हमारी मैरीकॉम ने पॉचवी बार विश्व बॉक्सिंग चैम्पियनशीप जीती है, ऐसी स्त्रियॉ हमारे समाज की शान है। सानिया मिर्ज़ा ने क्या किया, क्रिकेट टेनिस और फिल्मों के अलावा हमारे देश धर्म की और राजनीति को इंसाफ मिलता है। अन्य खेल विशेष रूप से भारतीय खेल पुरातत्व के विषय होते जा रहे है।
Monday, 13 September 2010
बाबा प्रणाम
कल शाम को कारंत जी की व्याख्यान माला में गया, ऐसा महसूस होता है कि कारंत जी आज भी हमारे बीच मौजूद है। अपने विद्यार्थीयों के काम में वे प्रतिध्वनित हो रहे हैं। अच्छाई का कोई अंत नहीं होता। परन्तु आज के मीडियोकर थियेटर सीन को देखकर वे क्षुब्ध अवश्य हों, हम अच्छा काम कर सकें यही आशीर्वाद मांगते हैं।
Sunday, 12 September 2010
Saturday, 11 September 2010
क्रातिकारी संत तरुण सागर जी से मिला
क्रातिकारी संत तरुण सागर जी से मिला, पहली बार लगा मुनि ऋषि परम्परा के किसी व्यक्ति से साक्षात्कार हुआ। अति शुभ
Thursday, 9 September 2010
पिता
अपनी मुस्कान में छिपा लेते थे, तुम-पिता!
सारे तनाव, तुम्हारे प्रशस्त ललाट पर ग़ायब हो जाते,
सारी परेशानियाँ,
तुम्हारे सिगरेट के धुँए के साथ
कहीं ग़ायब हो जाती थीं
सारी कामनाओं की पूर्ति तुम में थी,
सारा ज्ञान, सारी शिक्षा, सारा जीवन-व्यवहार
परोसते थे तुम किसी स्वादिष्ट व्यंजन की तरह
सारी जानकारी, सारी स्थितियाँ तुमसे परिचालित थीं
तुम्हारे बिना, जीवन की कल्पना नहीं थी
तुम्हारे बिना क्या होगा-
ईमानदारी के प्रति तुम्हारी प्रतिबद्धता,
रक्त बन, नसों में बही, पिता!
पर, तुम्हारे बाद सारी दुनिया,
एक खोखले बाजे की तरह लगी,
जहाँ सुनने को बहुत-सी ध्वनियाँ हैं
पर, भीतर कुछ नहीं,
जीवन चल रहा है, चलेगा
पर, तुम आवाज़ देने पर कहाँ आओगे,
फिर लौटकर मेरे पास, पिता!
Wednesday, 8 September 2010
अनुभूति!
कितनी भी कोशिशें!
कितने ही प्रयास!!
ढेर सारे प्रयत्न!!
सब वृथा सिद्ध हुए,
जब भी,
मैंने यह कोशिश की थी कि मैं कुछ हूँ,
भीतर से, माँ की कोमल स्नेहिल
लताड़ भरी झिड़की आती-
टूगा! तू बड़ा हो गया है, रे!
और मैं जितना था, उससे और छोटा हो जाता,
आज, देह से अनुपस्थित माँ
फिर कहती है-ख़ुद को छोटा न समझना!
मज़बूत बने रहना!!
और मेरे भीतर एक हिमालय,
कितने ही प्रयास!!
ढेर सारे प्रयत्न!!
सब वृथा सिद्ध हुए,
जब भी,
मैंने यह कोशिश की थी कि मैं कुछ हूँ,
भीतर से, माँ की कोमल स्नेहिल
लताड़ भरी झिड़की आती-
टूगा! तू बड़ा हो गया है, रे!
और मैं जितना था, उससे और छोटा हो जाता,
आज, देह से अनुपस्थित माँ
फिर कहती है-ख़ुद को छोटा न समझना!
मज़बूत बने रहना!!
और मेरे भीतर एक हिमालय,
आकार लेने लगता है|
वो हिमालय, तुम हो माँ!
तुम हो, सिर्फ़ तुम हो माँ!
-तेरा आलोक
Subscribe to:
Posts (Atom)



_300.jpg)





