कल अवतार फिल्म देखी.मुझे फिल्म कि टेक्नोलोजी और भव्य इफेक्ट के बीच बहती मानवीय संवेदनाओ और भावनाओ के सूक्ष्म मिश्रण ने लगभग चमत्कृत कर दिया .सुना है कि कैमरोन ने 1995 मै इसकी पटकथा का प्रारूप तयार किया था .इससे लगभग सात ड्राफ्ट तैयार हुए ,इतनी विस्मृत पटकथा .सिर्फ बड़े बजट से ही बड़ी फ़िल्मे सार्थक फ़िल्मे नहीं बनती.मानवीय से परे का संसार पेन्डोरा गृह दिखलाने में निर्देशक का अहम् योगदान है .सबसे महत्वपूर्ण है -प्यार ,उससे उपजी ताकत ,और स्वयं को शक्तिमान समझने वालो को योद्धा की भांति धूल चटाना,जीवन धर्म और एक्टिव लाइफ को रेखांकित करता है .अंत में जैक का अवतार के रूप में रह जाना और पंडोरा पर अपने प्यार के साथ एक नया जीवन रूपक रखने को तैयार मानव एक नए रूपाकार में .
सचमुच ही अदभुत फिल्म. मेरी तरफ से रस्सी कलाकारों ,टेकनिसियन,स्टाफ ,निर्देशक और पूरी टीम को असंख्य बधाइयाँ और शुभकामनाये . दोस्त आलोक 11 :08am
ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Tuesday, 12 January 2010
चिंता
आज चारों ओर मिडियोक्रेसी इतनी बढ़ गयी है कि समाज का कोई भी पद उससे अछूता नहीं रहा .सबसे दुखद पहलू तो यह है कि समाज के उच्चतम मानकों एवं मूल्यों वाले क्षेत्र पर भी इसकी छाया पड़ रही है.शिक्षा,स्वास्थ्य ,कला ,पत्रकारिता,न्याय ,विधि ,प्रशासन ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जो अपने नैतिकता के उच्च मानदंडो पर खरा उतरता हो.दूसरे दर्जे के और दोयम स्तर के लोगो को इतना अधिक महत्व हर स्तर पर मिलता है कि सच्चे लोग कई बार स्वयं को हतप्रभ पाते है.मिडियोक्रेसी का दायरा इतना बड़ा है और उनकी नेटवर्किंग इतनी अच्छी है कि गूगल का सर्च इंजिन भी शर्मा जाए .कमीशनखोरी आज इतनी है कि उच्च पदों पर बैठे लोगे भी बेशर्मी से अपने उपरवाले का हवाला देते हुए कमीशन मांगते है .सरकारी पैसे का दुरूपयोग देखना हो तो सरकारी संस्थानों को देखिये .जहा बिजली,फ़ोन,चाय,कागच.पेन का एक दिन का खर्चा ही एक परिवार के पेट भरने को काफी होगा.उच्य पदों पर आज काबिल व्यक्ति कम है बल्कि राजसत्ता के गलियारों में घुमने वाले अवसरवादी व्यक्ति अधिक है जो पदों पर बैठकर उनका एवं स्वयं के परिचितों का उद्धार करने मै जुट जाते है.एक अच्छा शिक्षक,एक अच्छा डॉक्टर या इंजिनियर,कलाकार ,पत्रकार ,वकील या कलेक्टर आज कि व्यवस्था में क्या करे , मात्र इतना ही कि वह स्वयं को भ्रस्टाचार मै लिप्त न करके अपना काम ईमानदारी से करे.पर वहा भी उसे प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा.वह दूसरो के लिए लाभप्रद नहीं रहेगा सो उसे परेसान किया जायेगा. एक नई सामाजिक क्रांति ही इसका एकमात्र विकल्प है पर वह क्रांति और परिवर्तन पूर्ण रूप से अहिंसक ,मानवतापूर्ण ,एवं कल्याणकारी होनी चाहिए . दोस्त आलोक 10:55 am bhopal
Sunday, 10 January 2010
कला साधना सम्मान
यानि आज भोपाल में कला परिषद् मुझे कला साधना सम्मान शाम 4 बजे देने वाली है.
थियेटर करने कि चीज़ है
तब समझ आती है ज़िन्दगी
और ज़िन्दगी के मायने...
ईश्वर, माता-पिता और कारन्त बाबा को प्रणाम
आलोक
10.30 AM, BHOPAL
X-MAS
प्रति वर्ष कि भांति आज भी 25 दिसंबर है क्रिसमस का दिन. दुनिया के अरबों ईसाई भाई बहन बच्चों को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाये. करुणावतार क्राइस्ट आज दुनिया में आये थे हमें अहिंसा, इंसानियत, प्यार का सन्देश देने. जात पात, छुआछूत से ऊपर विश्वमानव, विश्वसमाज कि एक वृहद दृष्टि उन्होंने दी थी. ईसा का सन्देश बाद के समय में बुद्ध, महावीर, लाओते, कंफ्युशियन के काल में भी गुंजित हुआ. आज जब पूरी दुनिया वैश्विक आतंकवाद से पीड़ित है, ईसा और भी प्रासंगिक लगते है.
ईसा कि आवश्यकता आज और अधिक लगती है. जिन्होंने स्वयं कष्ट, पीड़ा सही, दूसरों कि खातिर ऐसे त्याग कि मूर्ति को प्रणाम.
दोस्त आलोक
10:15 AM : Dt. 25.12.2009
Bhopal (MP)
ईसा कि आवश्यकता आज और अधिक लगती है. जिन्होंने स्वयं कष्ट, पीड़ा सही, दूसरों कि खातिर ऐसे त्याग कि मूर्ति को प्रणाम.
दोस्त आलोक
10:15 AM : Dt. 25.12.2009
Bhopal (MP)
Thursday, 17 December 2009
जीवन नाम है नित नयेपन का
जीवन नाम है नित नयेपन का.
स्फूर्ति, ऊर्जा, सकारात्मक सोच का मिश्रण ही जीवन को सुन्दर बनता है.
किसी क्रिएटिव इंसान के लिए ज़रूरी है कि वो अपने ऊपर संतुष्टि कि जंग कभी न लगने दे.
2009 समाप्त होने को है तो मैने 2010 के लिए नया कुछ करने की सोची है.
बांग्ला और मराठी में पाठ परम्परा काफी पहले से उपस्थित है.
बांग्ला में तो नाटकों का पाठ सुनने का भी टिकट खरीदकर लोग आते है.
लेकिन हिंदी में पाठ का अर्थ कवि सम्मलेन है जहाँ कुछ लोग अपनी कविताये पढ़ते है.
दरअसल शब्दों की मूल ध्वनि को पकड़ना, ध्वनि में छिपे अर्थ को उदघटित करना और
व्याख्यात्मक बिम्ब उत्पन्न करना, ये सब पाठ परंपरा की अनुस्युत और छिपे संस्पर्श है.
शब्दों का सही उच्चारण हमें उसमे छुपे भावनात्मक आवेग Emotional Force को पकड़ने में मदद करता है.
और रचना का सही पाठ एक निश्चित देह्गति और देहभाषा को भी प्रकट करता है.
चेहरे का सही भाव,भाषा,देह्गति मिलकर एक पूर्ण अर्थ को प्रकट ही नहीं करते वरन संप्रेषित भी करते है.
यह पूर्ण व्यक्तित्व निर्माण है..
इसीलिए सोचा प्रत्येक शनिवार में कुछ निश्चित श्रोता, दर्शक के सामने हिंदी में कविता, कहानी,नाट्य गीत, नाट्य संवाद पर पाठ प्रस्तुत करूं.
युवा पीढ़ी के लिए यह साहित्य, नाटक, कविता से साक्षात्कार के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास से भी इसे जोड़ा जाएगा..
राकेश दीक्षित,राजेंद्र कोठारी और मैंने एक दोपहर new market कॉफ़ी हाउस में बैठकर
भोपाल नगर निगम की चुनाव चर्चा के बीच यह तय किया कि
भोपाल में जितने प्राइवेट शिक्षा संस्थान है उनके विद्यार्थियों को भी इसमें शामिल किया जाए..
कला जगत कि विशेषकर हिंदीभाषी पट्टी कि यह समस्या हमेशा रही है कि
दूसरो से संवाद न कर अपनी ही दुनिया में उलझे रहते है ..
समाज-समाज कि बातें तो बहुत करते है परन्तु समाज से जुड़ते कितना है..
नए दर्शक भी हम नहीं तलाशते बस जो भारत भवन, रवींद्र भवन आता है वही हमारा दर्शक है..
क्योकि नहीं रंगमंच समाज के हर कोने तक पहुँचता हैं ,यह अपने श्रेष्ठ होने के अहंकार मैं मेंढक सा कुए में घुसे रहता है..
और दिखने वाले आसमान को ही अपनी दुनिया मानता समझता है..
होश मैं रहकर गाफिल रहना कोई हम रंगकर्मियों से सीखे
हम युवा पीढ़ी को संस्कारित करने और कलाक्षेत्र में लाने के लिए क्या कर रहे है ..
फिल्म और टेलीविजन ने थियेटर को ख़त्म कर दिया है.
दर्शक छीन लिए ऐसी घोषणा करने से रंगमंच का कोई भला नहीं होने वाला.
अच्छी फिल्म और टीवी के सामने हमारी तैयारी क्या है.
नए दर्शक आयें और नियमित रूप से जुड़े. ऐसी कौन सी योजना या ब्लू प्रिंट रंगकर्मियों के पास है.
प्रडक्शन ग्रांट से नाटक कर लेने से खुद का बायोडाटा ज़रूर बनता है
पर युवा रंगकर्मी के लिए शोध, प्रशिक्षण, पुस्तकालय, पत्रिका, डायरेक्ट्री
जैसी सुविधाओ के लिए हमेशा सरकारी मदद या ग्रांट कि अपेक्षा होती है.
पर स्वयं कि कार्यप्रणाली क्या हो यह भी विचारनीय है.
बहरहाल 15 दिसंबर वैशाली काम्प्लेक्स शाम 6.30 पर आये
आपको निराला, मुक्तिबोध, बच्चन, रघुवीर सहाय और अज्ञेय कि कविताओं का रसास्वाद मिलेगा.
परिपत्र में
दोस्त आलोक
10.29AM
स्फूर्ति, ऊर्जा, सकारात्मक सोच का मिश्रण ही जीवन को सुन्दर बनता है.
किसी क्रिएटिव इंसान के लिए ज़रूरी है कि वो अपने ऊपर संतुष्टि कि जंग कभी न लगने दे.
2009 समाप्त होने को है तो मैने 2010 के लिए नया कुछ करने की सोची है.
बांग्ला और मराठी में पाठ परम्परा काफी पहले से उपस्थित है.
बांग्ला में तो नाटकों का पाठ सुनने का भी टिकट खरीदकर लोग आते है.
लेकिन हिंदी में पाठ का अर्थ कवि सम्मलेन है जहाँ कुछ लोग अपनी कविताये पढ़ते है.
दरअसल शब्दों की मूल ध्वनि को पकड़ना, ध्वनि में छिपे अर्थ को उदघटित करना और
व्याख्यात्मक बिम्ब उत्पन्न करना, ये सब पाठ परंपरा की अनुस्युत और छिपे संस्पर्श है.शब्दों का सही उच्चारण हमें उसमे छुपे भावनात्मक आवेग Emotional Force को पकड़ने में मदद करता है.
और रचना का सही पाठ एक निश्चित देह्गति और देहभाषा को भी प्रकट करता है.
चेहरे का सही भाव,भाषा,देह्गति मिलकर एक पूर्ण अर्थ को प्रकट ही नहीं करते वरन संप्रेषित भी करते है.
यह पूर्ण व्यक्तित्व निर्माण है..
इसीलिए सोचा प्रत्येक शनिवार में कुछ निश्चित श्रोता, दर्शक के सामने हिंदी में कविता, कहानी,नाट्य गीत, नाट्य संवाद पर पाठ प्रस्तुत करूं.
युवा पीढ़ी के लिए यह साहित्य, नाटक, कविता से साक्षात्कार के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास से भी इसे जोड़ा जाएगा..
राकेश दीक्षित,राजेंद्र कोठारी और मैंने एक दोपहर new market कॉफ़ी हाउस में बैठकर
भोपाल नगर निगम की चुनाव चर्चा के बीच यह तय किया कि
भोपाल में जितने प्राइवेट शिक्षा संस्थान है उनके विद्यार्थियों को भी इसमें शामिल किया जाए..
कला जगत कि विशेषकर हिंदीभाषी पट्टी कि यह समस्या हमेशा रही है कि
दूसरो से संवाद न कर अपनी ही दुनिया में उलझे रहते है ..
समाज-समाज कि बातें तो बहुत करते है परन्तु समाज से जुड़ते कितना है..
नए दर्शक भी हम नहीं तलाशते बस जो भारत भवन, रवींद्र भवन आता है वही हमारा दर्शक है..
क्योकि नहीं रंगमंच समाज के हर कोने तक पहुँचता हैं ,यह अपने श्रेष्ठ होने के अहंकार मैं मेंढक सा कुए में घुसे रहता है..
और दिखने वाले आसमान को ही अपनी दुनिया मानता समझता है..
होश मैं रहकर गाफिल रहना कोई हम रंगकर्मियों से सीखे
हम युवा पीढ़ी को संस्कारित करने और कलाक्षेत्र में लाने के लिए क्या कर रहे है ..
फिल्म और टेलीविजन ने थियेटर को ख़त्म कर दिया है.
दर्शक छीन लिए ऐसी घोषणा करने से रंगमंच का कोई भला नहीं होने वाला.
अच्छी फिल्म और टीवी के सामने हमारी तैयारी क्या है.
नए दर्शक आयें और नियमित रूप से जुड़े. ऐसी कौन सी योजना या ब्लू प्रिंट रंगकर्मियों के पास है.
प्रडक्शन ग्रांट से नाटक कर लेने से खुद का बायोडाटा ज़रूर बनता है
पर युवा रंगकर्मी के लिए शोध, प्रशिक्षण, पुस्तकालय, पत्रिका, डायरेक्ट्री
जैसी सुविधाओ के लिए हमेशा सरकारी मदद या ग्रांट कि अपेक्षा होती है.
पर स्वयं कि कार्यप्रणाली क्या हो यह भी विचारनीय है.
बहरहाल 15 दिसंबर वैशाली काम्प्लेक्स शाम 6.30 पर आये
आपको निराला, मुक्तिबोध, बच्चन, रघुवीर सहाय और अज्ञेय कि कविताओं का रसास्वाद मिलेगा.
परिपत्र में
दोस्त आलोक
10.29AM
Sunday, 13 December 2009
बच्चों, तुम कितने समझदार हो
बच्चों, तुम कितने समझदार हो
कितने प्यारे हो
तुम बच्चों ने Sound of Music में रंग भरे
भगत कि गत बनाई
बच्चों तुमने एम्फी थियेटर में
कला के सच्चे रंग बिखेरे
Recorded Track पर तुमने
अभिनय किया यूँ,
कि पारंगत अभिनेता भी
चकरा जाये
चकमा खा जाये
बच्चों तुम्हारा आभारी हूँ
हमेशा के लिए
मेरे जीवन में यूँ ही बने रहना
संस्कार वैली के बच्चों
तुम्हारा जीवन शुभ हो
तुम खुशियों के आसमान नापों
सृजन के नए शिखर छुओ
सच्चे उत्तराधिकारी बनो
भारतीय मानव समाज के
शुभकामनाओ के साथ
तुम्हारा आलोक अंकल
कितने प्यारे हो
तुम बच्चों ने Sound of Music में रंग भरे
भगत कि गत बनाई
बच्चों तुमने एम्फी थियेटर में
कला के सच्चे रंग बिखेरे
Recorded Track पर तुमने
अभिनय किया यूँ,
कि पारंगत अभिनेता भी
चकरा जाये
चकमा खा जाये
बच्चों तुम्हारा आभारी हूँ
हमेशा के लिए
मेरे जीवन में यूँ ही बने रहना
संस्कार वैली के बच्चों
तुम्हारा जीवन शुभ हो
तुम खुशियों के आसमान नापों
सृजन के नए शिखर छुओ
सच्चे उत्तराधिकारी बनो
भारतीय मानव समाज के
शुभकामनाओ के साथ
तुम्हारा आलोक अंकल
हजारों जिंदगियां खामोश
आज 3 दिसंबर 2009 है. आज से ठीक पच्चीस वर्ष पहले भोपाल में विश्व कि अब तक कि सबसे भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई थी. यूनियन कार्बाइड कि फैक्ट्री से निकली ज़हरीली गैस ने हजारों ज़िन्दीगियों को खामोश कर दिया तो हजारों ऐसे भी है जो जिंदा तो है पर लाश कि तरह. उस वक़्त जो बच्चे दुनिया में आने को थे वह तरह - तरह कि बीमारियों का घर बन गए. हर बरसी पर मोमबत्ती जलना, मशाल प्रदर्शन और दो दिन चर्चा यही बचा रहा है. आज तक सच्चे हकदारों को मुआवजा नहीं मिला या न के बराबर मिला, वही प्रभावशाली लोगों ने तिगुना तक बना लिए. दवाओ के लिए तरसते बदहाल, बीमार आज भी बैंक में भटकते है और उनके लिए आई दवाइयां भी उन्हें न मिलकर कहीं और बिक जाती है. भोपाल कि चमचमाहट, विकास के पीछे एक चेहरा ये भी है.
बड़े व्यवसायी घरानों को इस बारे में कुछ ठोस कर दिखाना चाहिए. समाज में ही तो व्यवसाय है. समाज उन्नत, खुशहाल, स्वस्थ नहीं रहेगा तो अंततः इसकी क्रय शक्ति पर भी असर पड़ेगा जो अंततः आर्थिक रूप से समृद्ध कार्पोरेट घरानों को चुकाना होगा. अतः बेहतर है कि उत्पाद पर होने वाले प्रमोशनल खर्च को कम कर उसका एक अंश भोपाल के वास्तविक गैस पीड़ितों और परिजनों को मिले यही उनके प्रति हमारी सच्ची विनम्र श्रृद्धांजलि होगी और उनके जीवित परिजनों को मानवीय सहायता भी.
इसी आशा के साथ.
दोस्त आलोक
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