"जीवन जीने की कला ही सबसे बड़ी कला है| सारी कलाएँ उस कला को समृद्ध करने के लिए हैं, जिसे हम जीने की कला कहते हैं|"
जब प्रख्यात नाटककार, निर्देशक बर्तोल्त ब्रेख्त ने जब यह कहा था तो वे दरअसल कला जीवन के लिए या जीवन कला के लिए है; के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे| 'आर्ट फॉर आर्ट सेक' का क्या अर्थ है? जब तक वह समाज, लोगों और उनकी महत्त्वाकांक्षा, सपनों, संघर्षों को प्रतिबिंबित नहीं करती; वह एक मानसिक अय्याशी ही है|
हमारे यहाँ कला फिल्में कभी भी उन दर्शकों तक नहीं पहुँची, जिनके लिए वे बनायी गयी थीं या जिनकी ज़िन्दगी को व्याख्यायित करती थीं| इसी कारण तमाम बुद्धिजीवी आग्रहों, प्रशंसा, पुरस्कार के बाद भी वे अवाम या आमजन की फिल्में कभी नहीं बन पायीं| कई फिल्में प्रदर्शित ही नहीं हुईं और कुछेक सुबह के शो में एक सप्ताह चलीं| अंत में वही हुआ जो अपेक्षित था| कला एवं समानांतर फिल्मों के सभी दिग्गज श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलाणी, केतन मेहता, नसीर भाई, ओमपुरी, पंकज कपूर, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, कुलभूषण खरबंदा सभी बाद में मुम्बइया आम फिल्मों की भीड़ का हिस्सा बने| यहाँ भी वो सफल रहे पर 'वो आग' नहीं दिखी जो तब थी| न ही वे मुम्बइया फिल्म इंडस्ट्री की भेड़चाल को बदल सके|
आज कारपोरेट जगत के दखल ने सृजन की सारी संभावनाओं को समाप्त नहीं किया, परन्तु धुंधला अवश्य किया है| और बाज़ारोन्मुखी शक्तियों के आर्थिक जाल ने प्रतिभा को अपना गुलाम बना लिया है| मुम्बइया फिल्मों में इन दिनों बड़े प्रयोग हो रहे हैं, परन्तु वे प्रतिशत में कितने हैं? उनकी सफलता का प्रतिशत क्या है? दरअसल, बड़े सितारों द्वारा शासित और पूँजीपतियों के नियंत्रण ने बाज़ार पर एकाधिकार कर रखा है| परन्तु, फिर भी आमजन इन फिल्मों को देखने बड़ी संख्या में इसीलिये जाता है क्योंकि वहाँ वो अपने सपनों को देखता है; जीवन के यथार्थ से क्षणिक पलायन का सुख लेता है और अंत में बुराई पर अच्छाई की विजय देख स्वयं को विजेता मान, सिनेमाघर से निकलता है| कल्पना का मरहम यथार्थ के मवाद पर भारी पड़ जाता है!
-आपका दोस्त आलोक चटर्जी
ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Wednesday, 28 October 2009
खुद से सवाल पूछना|
ख़ुद से सवाल पूछना
सबसे बड़ा सवाल है
कला है
ख़ुद को समझना
दूसरों को समझाते-समझाते
हम रह जाते हैं, अज्ञात
स्वयं से|
# # # # # # # #
सबसे बड़ा सवाल है
कला है
ख़ुद को समझना
दूसरों को समझाते-समझाते
हम रह जाते हैं, अज्ञात
स्वयं से|
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Tuesday, 27 October 2009
स्मृति!
क्या है स्मृति?
या जिसे कहते हैं, याद
वह क्या है?
भावनाओं की गुत्थी?
अनुभूत किये गए, कुछ क्षण
कोई सुखद या दुखद बात
क्या है, स्मृति?
क्यों दोहराते हैं, स्मृतियों को
स्मृत करते हुए,
हो जाती है, विस्मृत एक दिन,
स्मृतियाँ!
बची रहती है केवल,
प्याज की भीतर की,
परतों की परतों का,
शेष रह जाता है, हथेली पर
खालीपन;
हथेली पर बैठे, स्वप्न-सा!
या जिसे कहते हैं, याद
वह क्या है?
भावनाओं की गुत्थी?
अनुभूत किये गए, कुछ क्षण
कोई सुखद या दुखद बात
क्या है, स्मृति?
क्यों दोहराते हैं, स्मृतियों को
स्मृत करते हुए,
हो जाती है, विस्मृत एक दिन,
स्मृतियाँ!
बची रहती है केवल,
प्याज की भीतर की,
परतों की परतों का,
शेष रह जाता है, हथेली पर
खालीपन;
हथेली पर बैठे, स्वप्न-सा!
लिखना क्यों ज़रूरी है?
लिखना क्यों ज़रूरी है? क्या खुद को अभिव्यक्त करने के लिए? ये बतलाने के लिए कि हमें कितना पता है या ये जतलाने के लिए कि हम कितना जानते हैं? वह एक क्षण जब व्यक्ति स्वयं को रोक नहीं पाता| एक हूक-सी उठाती है कि अब रहा नहीं जाएगा| तब जो भीतर है; वह बाहर उमड़ आता है| तब, कब शब्द, कहाँ से झरने लगते हैं; यह स्वयं को भी नहीं पता होता| कहें तो एक प्रेरणा-सी उमड़ती है| चाहे तो उसे ईश्वरीय कहें या माता-पिता का आशीर्वाद कहें| सब सहज एवं स्वमेव घटित होता-जाता है| मुझे लगता है, हममें से हर एक के अन्दर एक लेखक, एक कवि सोया पड़ा है| जब वह जागे, तभी सवेरा! सभी के जीवन में सृजन का यह सवेरा जल्दी आये, यही कामना है| प्रतिक्रया की प्रतीक्षा में आपका दोस्त आलोक चटर्जी!
Monday, 26 October 2009
ओ! मस्तक विराट!
ओ! मस्तक विराट!
अभी नहीं मुकुट,
अभी नहीं अलंकार!
अभी नहीं तिलक,
अभी नहीं राज्य-भार!
एक दिन माथे मेरे,
सूर्य होगा उदीय,
इतना पर्याप्त मुझे अभी!
-कुंअर नारायण सिंह
"एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
अभी नहीं मुकुट,
अभी नहीं अलंकार!
अभी नहीं तिलक,
अभी नहीं राज्य-भार!
एक दिन माथे मेरे,
सूर्य होगा उदीय,
इतना पर्याप्त मुझे अभी!
-कुंअर नारायण सिंह
"एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
aankhein!
कल मैंने देखा बहुत-सी आँखों को,
वे आँखें सपनों से भरी थीं,
उन सपनों में फैला था, एक विराट आकाश!
उन आँखों में थी ललक पढ़ने की,
अभिलाषा थी जीने की,
उमंग थी, दुनिया के लिए!
पर, उनके हाथ देखे मैंने कचरा बटोरते,
जूठे बर्तन साफ़ करते|
वे हाथ थे, ईंटों को लेकर चलते,
जिस पर बैठा, फिरंगी साहब मुस्कराता!
मैंने देखा उन हाथों को बूढ़े पिता को खाना खिलाते,
लाचार माँ को दवा पिलाते!
कभी-कभी फुरसत के वक़्त,
हमउम्रों के साथ बतियाते,
कितने व्यस्त हैं हाथ उनके,
कितनी सपनीली हैं उनकी आँखें!
वे आँखें हैं हमारे समाज के,
ग़रीब भूखे, पर कामगार बच्चों की!
उन आँखों में बड़ी आशा है,
क्या हमारे पास कुछ वक़्त है, उन्हें देने के लिए?
आपका चिंतनशील दोस्त; आलोक चटर्जी
वे आँखें सपनों से भरी थीं,
उन सपनों में फैला था, एक विराट आकाश!
उन आँखों में थी ललक पढ़ने की,
अभिलाषा थी जीने की,
उमंग थी, दुनिया के लिए!
पर, उनके हाथ देखे मैंने कचरा बटोरते,
जूठे बर्तन साफ़ करते|
वे हाथ थे, ईंटों को लेकर चलते,
जिस पर बैठा, फिरंगी साहब मुस्कराता!
मैंने देखा उन हाथों को बूढ़े पिता को खाना खिलाते,
लाचार माँ को दवा पिलाते!
कभी-कभी फुरसत के वक़्त,
हमउम्रों के साथ बतियाते,
कितने व्यस्त हैं हाथ उनके,
कितनी सपनीली हैं उनकी आँखें!
वे आँखें हैं हमारे समाज के,
ग़रीब भूखे, पर कामगार बच्चों की!
उन आँखों में बड़ी आशा है,
क्या हमारे पास कुछ वक़्त है, उन्हें देने के लिए?
आपका चिंतनशील दोस्त; आलोक चटर्जी
Sunday, 25 October 2009
raajneeti aur kalaa!!
आज जितनी राजनीति कला की दुनिया में है; उतनी राजनीति राजनीतिक दुनिया में भी नहीं है| साहित्यकार खेमों में बँटे हैं; तो नर्तक घरानों में| गायक अपने गुरु से बाहर नहीं आ पाते और रंगकर्मी तीन नाटक और दो कार्यशाला के बाद सरकारी अनुदान के लिए संस्था बना लेते हैं| "भोपाल" रंगमंच की दुनिया में, मुनाफाखोरी में अव्वल है| आये दिन होने वाले सरकारी आयोजनों में दर्शक मुफ़्त में कार्यक्रम देखता है और स्वयं को "कलारसिक" मानने का भ्रम पाल लेता है| युवा लड़कियों को भ्रम है कि दूरदर्शन में चेहरा दिखाने से वे एन्जिलिना जोली जैसी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर लेंगी| युवा निर्देशक निर्देशन कला पर कोई किताब नहीं पढ़ते| शहर में होने वाले नाटकों में से कुछ को चुनकर नाट्य समारोह करना और लाखों का अनुदान प्राप्त कर लेना यहाँ का शगल है| जबकि आज युवा रंगकर्मी रेडियो, वीडियो, टी व्ही, फिल्म और रंगमंच, सभी जगह सम्मानजनक स्थान पा रहा है और उन्हें भरपूर काम भी मिल रहा है| पर, कलाकार की वो गरिमा कहाँ गयी? सत्ताधीशों के सामने हैं-हैं करने वाला, समाज को किस प्रकार की नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला है? वह कितना संवेदनशील है, संस्कारित है और कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल है; यह एक यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर कलाकारों को ही ढूँढना है| सभी कलाकारों को स्वयं इसका रास्ता खोजना ही होगा| रविवार की सुबह कला की दुनिया में एक नया सूर्य उगे; यही अभीष्ट है!
अस्तु!!
आपका अपना दोस्त आलोक चटर्जी
Thursday, 22 October 2009
कलाकार की जाति, पंथ और धर्म एक ही है; इंसानियत, मानवता, सह्रदयता! कलाकार का ह्रदय उदार और संवेदनशील होना चाहिए! एक कलाकार को निष्णात पारखी भी होना चाहिए! दरअसल, वो यथार्थ और समाज के बीच "फिल्टर" का काम करता है! वह एक ऐसा शीशा है, जिसके प्रतिबिम्ब में व्यक्ति स्वयं को और समाज को देख सकता है! परन्तु आज का कलाकार सत्ता-सुविधा भोगी हो गया है! बिना सरकारी अनुदान के उसका काम नहीं चल सकता और स्थानीय दूरदर्शन में चौखटा दिखाए बगैर उसकी महत्त्वाकांक्षा की तृप्ति नहीं होती! विचारणीय प्रश्न है, क्या ऐसे कलाकार कला और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं?
आपका अपना "दोस्त" आलोक चटर्जी
आपका अपना "दोस्त" आलोक चटर्जी
Wednesday, 21 October 2009
भाईदूज!
कल भाईदूज का दिन था. दो मौके ऐसे होते हैं, जब मेरी कलाइयाँ सूनी होती हैं. एक राखी का अवसर और दूसरा भाईदूज का. दोनों ही मौंकों पर, एक उदासी और सूनापन लगता है. ये मुझे बचपन की यादों में ले जाता है, जब मैं ख़ुद ही अपने हाथों पर ढेर सारी राखियाँ बाँध लेता था और ख़ुद ही खुश हो लेता था. अब दूसरों को, उत्साह के साथ त्यौहार मनाते देख, मन खुश हो जाता है. लगता है कि मैं भी उसमें शामिल हूँ. कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं:गगन से दूर क्या है?
क्षितिज के पार क्या है?
क्या है, सागर की अतल गहराइयों में?
हिमालय के शिखरों पर क्या है?
क्या है, अतृप्त मन की कामना?
जीवन का चरम लक्ष्य क्या है?
सभी ब्लौगर्स को शुभकामनायें !! आपका dost आलोक चटर्जी
Thursday, 15 October 2009
प्यारे सनी!

प्यारे सनी!
तुम्हें पता नहीं, लेकिन मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि जिस दिन तुम पैदा हुए यानी १३ नवम्बर; डॉक्टर स्वामी के अस्पताल में, बेचैन घूम रहा था; सिजेरियन केस था, इसलिए मुझे याद है सनी, सुबह ७ बजे "पाश" की कवितायें पढ़ रहा था, "मैं तो घास हूँ, आपके किए-धरे पर फिर उगा हूँ", ७:२७ पर डॉक्टर ने सूचित किया, "सँभालिये अपने पहलवान को" मुझे याद है कि तुम हरे रंग की ट्रे में पड़े थे और तुम्हारी तब तक नाल भी नहीं काटी गई थी तुम मुस्करा रहे थे तुम्हारा रंग बहुत गोरा था, पाँव गुलाबी थे ये चित्र मेरी आँखों से मिट नहीं सकता न मुझे इसे याद करने की आवश्यकता है ये तो बस है!
तुम्हें पता नहीं, लेकिन मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि जिस दिन तुम पैदा हुए यानी १३ नवम्बर; डॉक्टर स्वामी के अस्पताल में, बेचैन घूम रहा था; सिजेरियन केस था, इसलिए मुझे याद है सनी, सुबह ७ बजे "पाश" की कवितायें पढ़ रहा था, "मैं तो घास हूँ, आपके किए-धरे पर फिर उगा हूँ", ७:२७ पर डॉक्टर ने सूचित किया, "सँभालिये अपने पहलवान को" मुझे याद है कि तुम हरे रंग की ट्रे में पड़े थे और तुम्हारी तब तक नाल भी नहीं काटी गई थी तुम मुस्करा रहे थे तुम्हारा रंग बहुत गोरा था, पाँव गुलाबी थे ये चित्र मेरी आँखों से मिट नहीं सकता न मुझे इसे याद करने की आवश्यकता है ये तो बस है!
तुम्हें तुम्हारे स्वर्णिम भविष्य हेतु शुभकामनाएँ! कार्यक्षेत्र में पराक्रमी बनो!!
दोनों बाँहों में तुम्हारे लिए असीमित प्यार लिए तुम्हारा पिता!!!
आज का विचार!
Wednesday, 14 October 2009
शंखनाद!
ये वादा और किसी से नहीं,
तुझसे है,
खुदी से मिलेगा खुदा,
ऐसे कुछ काम कर जाएँ दुनियाँ में,
बन जाएँ अपने नाखुदा!
lllllll
बहुत-बहुत गहरी
बहुत-बहुत चंचल
बहुत ख़ाली
बहुत भरी हुई
भावना के चरम आवेग में डूबी हैं,
तुम्हारी आँखें!
lllllllll
ख़ुद को जानना, दूसरे को जानना है,
दूसरे को जानना
दरअसल,
ख़ुद को ही जानना है,
जानने-पहचानने की इस प्रक्रिया में,
विस्मृत कर देना है,
"मैं", "तुम", "वो", "हम", "वे"
सारे रूपाकार संबोधन संज्ञाएँ,
हो जाएँ "एकाकार"!
lllllll
-आपका दोस्त आलोक चटर्जी
१४ अक्टूबर २००९
तुझसे है,
खुदी से मिलेगा खुदा,
ऐसे कुछ काम कर जाएँ दुनियाँ में,
बन जाएँ अपने नाखुदा!
lllllll
बहुत-बहुत गहरी
बहुत-बहुत चंचल
बहुत ख़ाली
बहुत भरी हुई
भावना के चरम आवेग में डूबी हैं,
तुम्हारी आँखें!
lllllllll
ख़ुद को जानना, दूसरे को जानना है,
दूसरे को जानना
दरअसल,
ख़ुद को ही जानना है,
जानने-पहचानने की इस प्रक्रिया में,
विस्मृत कर देना है,
"मैं", "तुम", "वो", "हम", "वे"
सारे रूपाकार संबोधन संज्ञाएँ,
हो जाएँ "एकाकार"!
lllllll
-आपका दोस्त आलोक चटर्जी
१४ अक्टूबर २००९
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