Wednesday, 14 October 2009

शंखनाद!

ये वादा और किसी से नहीं,
तुझसे है,
खुदी से मिलेगा खुदा,
ऐसे कुछ काम कर जाएँ दुनियाँ में,
बन जाएँ अपने नाखुदा!
lllllll
बहुत-बहुत गहरी
बहुत-बहुत चंचल
बहुत ख़ाली
बहुत भरी हुई
भावना के चरम आवेग में डूबी हैं,
तुम्हारी आँखें!
lllllllll
ख़ुद को जानना, दूसरे को जानना है,
दूसरे को जानना
दरअसल,
ख़ुद को ही जानना है,
जानने-पहचानने की इस प्रक्रिया में,
विस्मृत कर देना है,
"मैं", "तुम", "वो", "हम", "वे"
सारे रूपाकार संबोधन संज्ञाएँ,
हो जाएँ "एकाकार"!
lllllll
-आपका दोस्त आलोक चटर्जी
१४ अक्टूबर २००९

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