लिखना क्यों ज़रूरी है? क्या खुद को अभिव्यक्त करने के लिए? ये बतलाने के लिए कि हमें कितना पता है या ये जतलाने के लिए कि हम कितना जानते हैं? वह एक क्षण जब व्यक्ति स्वयं को रोक नहीं पाता| एक हूक-सी उठाती है कि अब रहा नहीं जाएगा| तब जो भीतर है; वह बाहर उमड़ आता है| तब, कब शब्द, कहाँ से झरने लगते हैं; यह स्वयं को भी नहीं पता होता| कहें तो एक प्रेरणा-सी उमड़ती है| चाहे तो उसे ईश्वरीय कहें या माता-पिता का आशीर्वाद कहें| सब सहज एवं स्वमेव घटित होता-जाता है| मुझे लगता है, हममें से हर एक के अन्दर एक लेखक, एक कवि सोया पड़ा है| जब वह जागे, तभी सवेरा! सभी के जीवन में सृजन का यह सवेरा जल्दी आये, यही कामना है| प्रतिक्रया की प्रतीक्षा में आपका दोस्त आलोक चटर्जी!
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