ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Sunday, 25 October 2009
raajneeti aur kalaa!!
आज जितनी राजनीति कला की दुनिया में है; उतनी राजनीति राजनीतिक दुनिया में भी नहीं है| साहित्यकार खेमों में बँटे हैं; तो नर्तक घरानों में| गायक अपने गुरु से बाहर नहीं आ पाते और रंगकर्मी तीन नाटक और दो कार्यशाला के बाद सरकारी अनुदान के लिए संस्था बना लेते हैं| "भोपाल" रंगमंच की दुनिया में, मुनाफाखोरी में अव्वल है| आये दिन होने वाले सरकारी आयोजनों में दर्शक मुफ़्त में कार्यक्रम देखता है और स्वयं को "कलारसिक" मानने का भ्रम पाल लेता है| युवा लड़कियों को भ्रम है कि दूरदर्शन में चेहरा दिखाने से वे एन्जिलिना जोली जैसी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर लेंगी| युवा निर्देशक निर्देशन कला पर कोई किताब नहीं पढ़ते| शहर में होने वाले नाटकों में से कुछ को चुनकर नाट्य समारोह करना और लाखों का अनुदान प्राप्त कर लेना यहाँ का शगल है| जबकि आज युवा रंगकर्मी रेडियो, वीडियो, टी व्ही, फिल्म और रंगमंच, सभी जगह सम्मानजनक स्थान पा रहा है और उन्हें भरपूर काम भी मिल रहा है| पर, कलाकार की वो गरिमा कहाँ गयी? सत्ताधीशों के सामने हैं-हैं करने वाला, समाज को किस प्रकार की नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला है? वह कितना संवेदनशील है, संस्कारित है और कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल है; यह एक यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर कलाकारों को ही ढूँढना है| सभी कलाकारों को स्वयं इसका रास्ता खोजना ही होगा| रविवार की सुबह कला की दुनिया में एक नया सूर्य उगे; यही अभीष्ट है!
अस्तु!!
आपका अपना दोस्त आलोक चटर्जी
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


रविवार की सुबह कला की दुनिया में एक नया सूर्य उगे; यही अभीष्ट है!
ReplyDeleteअस्तु!!....Aji hamari shubhkamnayen apke sath hain.
aapakee pratikriyaa kaa swaagat hai!
ReplyDelete