कल मैंने देखा बहुत-सी आँखों को,
वे आँखें सपनों से भरी थीं,
उन सपनों में फैला था, एक विराट आकाश!
उन आँखों में थी ललक पढ़ने की,
अभिलाषा थी जीने की,
उमंग थी, दुनिया के लिए!
पर, उनके हाथ देखे मैंने कचरा बटोरते,
जूठे बर्तन साफ़ करते|
वे हाथ थे, ईंटों को लेकर चलते,
जिस पर बैठा, फिरंगी साहब मुस्कराता!
मैंने देखा उन हाथों को बूढ़े पिता को खाना खिलाते,
लाचार माँ को दवा पिलाते!
कभी-कभी फुरसत के वक़्त,
हमउम्रों के साथ बतियाते,
कितने व्यस्त हैं हाथ उनके,
कितनी सपनीली हैं उनकी आँखें!
वे आँखें हैं हमारे समाज के,
ग़रीब भूखे, पर कामगार बच्चों की!
उन आँखों में बड़ी आशा है,
क्या हमारे पास कुछ वक़्त है, उन्हें देने के लिए?
आपका चिंतनशील दोस्त; आलोक चटर्जी
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