कलाकार की जाति, पंथ और धर्म एक ही है; इंसानियत, मानवता, सह्रदयता! कलाकार का ह्रदय उदार और संवेदनशील होना चाहिए! एक कलाकार को निष्णात पारखी भी होना चाहिए! दरअसल, वो यथार्थ और समाज के बीच "फिल्टर" का काम करता है! वह एक ऐसा शीशा है, जिसके प्रतिबिम्ब में व्यक्ति स्वयं को और समाज को देख सकता है! परन्तु आज का कलाकार सत्ता-सुविधा भोगी हो गया है! बिना सरकारी अनुदान के उसका काम नहीं चल सकता और स्थानीय दूरदर्शन में चौखटा दिखाए बगैर उसकी महत्त्वाकांक्षा की तृप्ति नहीं होती! विचारणीय प्रश्न है, क्या ऐसे कलाकार कला और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं?
आपका अपना "दोस्त" आलोक चटर्जी

चिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. मेरी शुभकामनाएं.
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हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]