Wednesday, 21 October 2009

भाईदूज!

कल भाईदूज का दिन था. दो मौके ऐसे होते हैं, जब मेरी कलाइयाँ सूनी होती हैं. एक राखी का अवसर और दूसरा भाईदूज का. दोनों ही मौंकों पर, एक उदासी और सूनापन लगता है. ये मुझे बचपन की यादों में ले जाता है, जब मैं ख़ुद ही अपने हाथों पर ढेर सारी राखियाँ बाँध लेता था और ख़ुद ही खुश हो लेता था. अब दूसरों को, उत्साह के साथ त्यौहार मनाते देख, मन खुश हो जाता है. लगता है कि मैं भी उसमें शामिल हूँ. कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं:

गगन से दूर क्या है?

क्षितिज के पार क्या है?

क्या है, सागर की अतल गहराइयों में?

हिमालय के शिखरों पर क्या है?

क्या है, अतृप्त मन की कामना?

जीवन का चरम लक्ष्य क्या है?

सभी ब्लौगर्स को शुभकामनायें !! आपका dost आलोक चटर्जी

5 comments:

  1. चिट्छा जगत में स्वागत है आलोक जी, आशा है रंगकर्म के बारे में उपयोगी सामग्री भी आपके चिट्ठे पर मिला करेगी। कुँवर नारायण सिंह व मर्लिन ब्रांडो की पक्तियाँ भी हिन्दी में लगाए तो अच्छा होगा।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    www.vyangya.blog.co.in

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  2. आप का स्वागत करते हुए मैं बहुत ही गौरवान्वित हूँ कि आपने ब्लॉग जगत मेंपदार्पण किया है. आप ब्लॉग जगत को अपने सार्थक लेखन कार्य से आलोकित करेंगे. इसी आशा के साथ आपको बधाई.
    ब्लॉग जगत में आपका स्वागत हैं,
    http://lalitdotcom.blogspot.com
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    http://shilpkarkemukhse.blogspot.com
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    http://adahakegoth.blogspot.com
    http://www.gurturgoth.com

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  3. हिंदी में लिखने के लिए स्वागत एवं शुभकामनाएं

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  4. आपका लेख पड्कर अछ्छा लगा, हिन्दी ब्लागिंग में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरे ब्लाग पर आपकी राय का स्वागत है, क्रपया आईये

    http://dilli6in.blogspot.com/

    मेरी शुभकामनाएं
    चारुल शुक्ल
    http://www.twitter.com/charulshukla

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