Saturday, 28 November 2009

बाबा के नाम



आज 26 नवम्बर 2009 को
मेरी रंगयात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव.
मध्यप्रदेश में पहली बार
कोई नाटक पूरी तरह से
ऑडियो ट्रैक पर अंग्रेजी भाषा में
रंगमंच पर खेला जायेगा.

साउंड ऑफ़ म्यूजिक ब्राडेव का मशहूर म्यूजिकल है.
इसमे औदेर एअर एम्फी थियेटर में
बदलते फ्लेक्स सेट और संगीतबद्ध
कोरियोग्राफी के साथ
संस्कार वैली स्कूल के बच्चो के साथ कर रहा हूँ.

इसके पहले टैगोर कि तोता कहानी,
प्रेमचंद का ईदगाह, व्यास का उस्मंगम कर चुका हूँ.

पर ये नया रंगानुभव है मेरे लिए भी.
साथ ही मध्यप्रदेश और भोपाल के रंगमंच के लिए.

इसी भोपाल में कारन्त जी ने मेरी रंगदिक्षा कि थी.

कारन्त बाबा तुम्हें प्रणाम...
आज गुरुवार है..

गुरूजी अपने आलोक को आशीर्वाद दीजिये....

और मेरा प्रणाम स्वीकार कीजिये.


बाबा आपका ही.
आलोक

शहीदों के नाम ये पाती ...




आज 26 नवम्बर है. 
एक वर्ष हो गए, 
"मुंबई ताज" पर आतंकवादी हमले को. 
उन शहीदों के नाम ये पाती ...


तुम न होते तो क्या होता?
तुम आये देवदूत बन
सबने देखा तुम्हें हेलीकाप्टर से उतरते
हवा में रस्सी से लटकते हुए
तुमने आपना खून दिया
तुमने अपने परिवार को छोड़ा 
दुसरो को बचाया
खुद न डरते हुए - रक्त आरक्त शरीर लिए
डरे हुए को संभाला 
तुम ईश्वर के भेजे दूत हो
आये हो हम पापियों कि रक्षा करने
सभी शहीदों को प्रणाम
एवं उनके परिवारों को जय हिंद 


दोस्त आलोक 

Tuesday, 17 November 2009

कला माध्यमों में एक अभिनेता की जीवन और मृत्यु



एक अभिनेता वास्तव में क्या चाहता है? यही कि उसे हरेक प्रकार कि चुनौतीपूर्ण भूमिका मिले और वो उन्हें सफलता से निभाए. परन्तु होता क्या है कि फिल्म, टीवी, रंगमंच तीनो माध्यमो में ही वो प्रारम्भिक मेहनत और सफलता के आधार पर वो एक इमेज या टाइप में बदल जाता है. बाद के वर्षो में वो उसे ही दोहराता रहता है. फिल्म में यह सबसे जल्दी होता है क्योंकि स्टार बनने के लिए इमेज चाहिए जैसे ही-मैन, एंग्रीयंगमैन, जम्पिंग जैक, लवर बॉय, एंटी हीरो, ये सब दरअसल ब्रांडिंग है. इसी आधार पर कथानक रचे जाते है और चीजों का भावुकता भरा अतिरेक चित्रण होता है. यह एक फंतासी को जन्म देता है जो दर्शकों के जीवन के यथार्थ से सतही तौर पर जुड़ते हुए एक काल्पनिक संतुष्टि देता है. जिस प्रकार के सीरियल आज चार रहे है उनमे अभिनय और अभिनेता के लिए बहुत अधिक कुछ नहीं है. वर्षों तक हिंदी रंगमंच कि शीर्ष अभिनेत्री थीं सुरेखा सीकरी और उत्तरा बावकर ने रंगमंच कालिदास से लेकर चेखव, मन्नू भंडारी, मोहन राकेश, शेक्शपियर और ब्रेख्त के नाटको में अत्यंत चुनौतीपूर्ण भूमिकाए निभाई परन्तु टीवी पर देखी बालिका वधु और जस्सी जैसी कोई नहीं जैसे सीरियलों में सास और दादी कि भूमिका स्टारडम हासिल की. परन्तु उन जैसी स्तर कि अभिनेत्रियों के लिए उसमे अभिनय की जटिल संभावनाए कितनी और कहाँ है? रंगमंच पर तुगलक और लुक बेक इन एंगर में कठिन भूमिकाओ का वर्षों तक निभाने के बाद मनोहर सिंह फिल्मों में धूर्त संपादक, चालाक नेता जैसी भूमिका में टाइप हो गए. प्रखर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को भी वर्षों बाद, ए वेड्नस्डे में अपने उपयुक्त भूमिका मिली है. अनुपम खेर जैसे विख्यात अभिनेता को भी इसी फिल्म में वर्षों बाद सृजनात्मक  आनंद मिला होगा, हालाकिं वे स्वयं 2005 में मैंने गाँधी को नहीं मारा इसी उद्देश्य के साथ बना चुके है.


आलोकनाथ जो बुनियाद से हमारे सामने आये थे, आज में घर घर खेली जैसी सीरियल से सरवाइव कर रहे है. एक बार बलराज साहनी ने कहा था कि मैं समाज बदलने फिल्मों में आया था, पर भूल गया था कि यहाँ बिज़नस मुख्य है. उद्देश्य ही व्यावसायिक है, तो उसमे सृजनात्मक कितनी बचेगी?


हालाँकि आज अमिताभ बच्चन हरेक प्रकार कि भूमिकाए कर रहे है लीकें यह मात्र उनका सौभाग्य है इंडस्ट्री का ट्रेंड नहीं.


रंगमंच एक सौभाग्यशाली संभावनापूर्ण माध्यम है जहाँ पहले दिन से ही बताया जाता है कि प्रत्येक बार भिन्न ढंग से भूमिका निभानी है इसके लिए समाज, जीवन-दर्शन, मनोविज्ञान का सहारा अन्य कला माध्यमों जैसे संगीत, पेंटिंग्स, कविता-साहित्य तो आधार है ही. यह अभिनेता का अधिक उर्वर-सृजनशील एवं प्रयोगवादी बनता है जो बने बनाये ढांचे को बार-बार तोड़ कर उसमे से एक नया ढांचा बनाता है. दर्शक चरित्र चित्रण और अभिनय का अस्वाद लेते है. स्तर कि प्रतीक्षा नहीं करते इसलिए नाट्य शास्त्र में कहा गया है कि प्रेक्षक को सुविचारित, संस्कारित, उदार, ग्रहणशील व्यक्ति होना चाहिए, वाही सच्चा दर्शक है, आज ऑडिएंस नहीं. जहाँ दर्शक के लिए ऐसा संस्कार वांछनीय हो वहां अभिनय-अभिनेता का स्थान कितना ऊँचा है. अपने में ही स्पष्ट है. कालिदास से गोर्की, चेखव से ब्रेख्त, सान्त्र से मोहन राकेश, धर्मवीर भारती आर्थर मिलर से लेकर धामू से रेखांकित करते है कि अभिनेता का जीवन रंगमच है, वहीँ अन्य माध्यमो में उसकी आकाल मृत्यु हो जाती है. 

अमिताभ आप औरों से अलग है



विभिन्न किरदारों को विशेष रूप से जटिल चरित्रों को निभाना
किसी भी माध्यम के अभिनेता के लिए एक कठिन चुनौती होता है ..
इस दृष्टि से " ब्लैक " के बाद " पा "
आपके अभिनव,अप्रतिम प्रयासों में से एक है..
मुजे व्यक्तिगत रूप से ऐसा लगता है कि एक अभिनेता के रूप में आप अधिक स्वतंत्र एवं प्रयोगवादी भूमिकाएं अब कर पा रहे है
जो अतुलनीय है..
हालाकि अपने युवा स्टारडम में आपने जो सफलता हासिल की उसमे एंग्रीयंगमैन इमेज के बाहर सफलता नहीं मिली ...
आपने "आलाप" ,"मिली " में अद्भुत अभिनय किया परन्तु वाही इमेज का चक्कर..
परन्तु अब आप डाकू, जिन्न कि भूमिकाएं भी मजे से निभा रहे है ..
एक अभिनेता के रूप में आप चरम आनंद ले रहे है ..
अवश्य ही आपके लिए भी ये अदभुत है साथ ही मुझ जैसे दर्शक जो आपको अपने कॉलेज
और नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के दिनों में सिल्वर स्क्रीन पर राज करते देख रहे है, के लिए अपने आदर्श अभिनेता को प्रयोगवादी जोखिम उठाते देख क्रिएटिव प्लेजर ले रहे है..
मेरी व्यक्तिगत इच्छा है कि शेक्सपीयर के "हेनरी द फोर्ड" पर आप कार्य करे तो एक और सोपान दर्शको के समक्ष आएगा
हालांकि मै यह नहीं जानता कि कमशियर्ली यह प्रस्ताव कितना कारगर हो सकता है..
बांग्ला रंगमंच के प्रख्यात कलाकार "गिरीश घोष"  के ऊपर भी आप अदभुत भूमिका निभा सकते है
जिनका अभिनय देखने रामकृष्ण परमहंस आया करते थे..


आप स्वस्थ और सक्रिय रहे
इसी शुभकामना के साथ
  आलोक चटर्जी 
     स्नातक
नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा
पता: H.I.G 101 नर्मदा अपार्टमेन्ट, सेक्टर बी ,सर्वधर्म कालोनी.कोलार रोड,भोपाल(म.प्र.)

राहुल है सच्ची दीवार






राहुल द्रविड़ एक शांत गंभीर शर्मीले व्यक्ति है,
लेकिन क्रिकेट के मैदान में वे एक अभेद दीवार है..
जिन्हें भेदना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों के लिए एक कठिन चुनौती है ..
सात माह बाद न्यूजीलैंड दौरे के पश्चात् कल उन्होंने सत्ताईसवां टेस्ट शतक जमाया,
वो भी ३२ पर चार विकेट गिरने के बाद दृश्यता और संकल्प को दर्शाता है ..
साथ ही वे ग्यारह हजारी रन बनाने वाले विश्व क्रिकेट के पांचवे बल्लेबाज बन गए है ..
वे इसी तरह देश कि सेवा करते रहे ....
इसी कामना के साथ द्रविड़ को सारे देशवासियों के साथ मेरी भी बधाई...

Saturday, 14 November 2009






आज एक आवाज़ सुनी 
वो आवाज़ कभी मेरे लिए भी गाती थी


कोई गीत उसने मेरे लिए गाया था 
कोई एक नाम भी उसने दिया था मुझे 


वो गीत गुम गया है 
वो नाम कहीं खो गया है 


आज फिर उस आवाज़ में 
उस पुराने क्षण को महसूस किया मैंने 
अतीत की धुंध में खो गया मैं 


संबंधों के मकड़जाल ने 
कहीं रिश्ते को जकड लिया


अब एक गहरी उदासी भरी 
शाम है 


इन्तजार करती आँखें 
और कान हैं 


एक अनवरत दारुष प्रतीक्षा है....

(१४ नव.०९ दोपहर २:४७)

बाल दिवस








आज बाल दिवस पर विश्व के सभी बच्चो को हार्दिक शुभकामनाये और बधाई...
वे  ही भविष्य है समाज के आगामी निर्माता और नियंत्रक हैं
वे ही हमारी समूची मानवता के सच्चे उत्तराधिकारी हैं...


पर आज हमें अपने से ये भी पूछना चाहिए की आखिर किस प्रकार की दुनिया हम उनके लिए छोडेंगे 
ग्लोबल वार्मिंग,आण्विक हथियार,वैश्विक आतंकवाद और भौतिकतावादी अंधी दौड़ से भरी कौन सी दुनिया 
उनका क्या भला करेगी...


आज बाल दिवस पर हमें ये भी सोचना चाहियें की स्कूल आज यातनागृहों में बदल रहें है 
जहाँ बच्चे रट्टू तोतों की तरह पाठ पढ़ रहें है समझ तो पता नहीं क्या रहें हैं ?
क्योंकि समझानेवाला शिक्षक ही माडलों जैसे निर्दयी रिंगमास्टर में बदल गए हैं ...
कविता की जगह जिंगल ने और कहानी की जगह अश्लील सन्देश लेते जा रहे हैं...
ऐसे समाज में हमें बच्चों को सच्ची खुशी, मुस्कराहट, देखभाल और संस्कार देना चाहियें ..
साथ  ही कोशिश करनी चाहिये कि सबसे कीमती चीज बची रहें जो है
मासूमियत...
जिसे बच्चे अनजाने ही खोते जा रहे हैं..

बच्चो....
हम सभी बड़ों को माफ़ करना...
हम बडें ही इअसके लिए जिम्मेदार हैं...

तुम्हारी  जिंदगी में 
हंसी..
कविता..
परियां..
तितली..
रंग..
हमेशा मौजूद रहें....


हैप्पी बाल दिवस.......


आपका दोस्त आलोक चटर्जी ....

(१४ नव. दोपहर २:३८ )


Thursday, 12 November 2009

क्या मै स्वयं को जानता हूँ ?




क्या मै स्वयं को जानता हूँ ?
नहीं...
क्या जानने की कोशिश करता हूँ ?
हां...
तो क्या पाया ?
यही कि कुछ है ही नहीं कहने को,
कुछ है ही नहीं पाने को...
कुछ पाया सब पड़ा रह जाता है यहीं
हमारे देहान्तर के बाद...

(१३ नव.प्रातः ११:१०)

जीवन









जीवन स्वयं प्रवाहमान है...
समय कि भांति..
उसे पकड़ने कि कोशिश नहीं करना चाहिए.
स्वयं को प्रवाह में समर्पित कर देना चाहिए..
बहने देना चाहिए......


(१३ नव.प्रातः ११:०५ )

जीवन के रंग



आज का दिन भावनाओ से उथल-पुथल भरा दिन है..
आज मेरे बेटे का जन्मदिन है
और वो दूर बडोदरा में है
अभी घर पर सचिन,राज(दोस्त संस्था के रंगकर्मी) और शम्मी (सनी के बचपन का दोस्त)
घर पर केक लेकर आये और हम सबने केक काटकर खाया,
फोन ऑन रखा था,और सनी सेव संवाद हो रहा था
एक अद्भुत,सघन और भावुक क्षण था ..
दूसरी ओरआज से तीन साल पहले आज ही के दिन शाम छह बजे मैंने अपनी माँ को खो दिया था..
एक ओर मेरे बेटे को जन्मदिन कि बधाई
और दूसरी ओर ईश्वर से माँ कि मुक्ति के लिए प्रार्थना..
और इसके बीच में एक पिता और बेटे कि भूमिका में
मै....
और दिन भर विद्यार्थियों,बच्चो,रंगकर्मियों के साथ काम करता
मै....
अपने को देह और कल से मुक्त होता पता हूँ...
जीवन कितना दिलचस्प और रंगों से भरा हुआ है.....
और दो चटख विरोधी भावनाओ के रंग एक साथ,
एक ही दिन,
एक ही क्षण..
उपस्थित होते है .....
इस अद्भुत जीवन को प्रणाम.....


प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में
आपका दोस्त आलोक
(12 नव.सायं ०८:०५)

तुम्हारे जन्मदिन पर



तुम्हारे जन्मदिन पर नहीं लिख सकता कोई कविता
दोनों हाथ उठाकर,ईश्वर से करता हूँ प्रार्थना
तुम सफल, यशस्वी, पराक्रमी बनो,
निर्भय बनो,
जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करो तुम
मानवता का करुणा का सागर का लहराता रहें भीतर हमेशा तुम्हारे
कोई सीख, आदेश नहीं दे सकता मै तुम्हें
बल्कि तुमने ही बार-बार निर्देशित किया है मुझे
इक सपना हो तुम मेरा,
जो रूप धर आया है मेरे जीवन कि बगिया में
सनी मै तुम पर कोई कविता नहीं लिख सकता
क्योंकि तुम मेरी सबसे अच्छी कविता हो....
तुम्हारा डैडू....
सायं ७:५० मै मेरे ड्राइंग रूम में





Sunday, 8 November 2009

अलग सुबह



सुबह अंधेर 5:45
सड़क किनारे अलाव तापते कुछ ऑटो वाले प्रतीक्षा कर रहे है, पहले ग्राहक की.
जिससे शुरू हो रोजी रोटी का एक और दिन
सफाईवाली स्त्रियाँ मुंह पर कपडा लपेट झाडू लगाने के पहले
सुड़क रही है चाय खुद को सर्दीली सुबह में गर्म करने के लिए
छोटे बच्चे साइकिलों पर पेपर बाँट रहे है
और देख रहे है उन बच्चो को
जो तैयार होकर माँ के साथ स्टाप पर
स्कूल बस की प्रतीक्षा कर रहे है.
वे अपने बचपन को देख रहे है लाचार
और पहुंचा रहे है हमारे आपके यहाँ ताजा अखबार
कुछ महिलाये अपनी चर्बी कम करने Morning Walk पर जाती है.
पर जारी है वहां पर भी सास देवर ननद की बातें
एक पचपन साल का व्यक्ति बगीचे में योग करता है खुद को फिट रखने के लिए
कुछ वृद्ध जीवन को रंगों से भरने निरर्थक लगाते है हास्य क्लब का ठहाका
घरों में चाय के बर्तन खड़कने की आवाजें है. कहीं पूजा के मंत्र स्वर है.
कुछ फूल तोड़ने बेचने वाले भी है
दूध के पैकेट बांटता लड़का है.
बर्तन साफ करने वाली महरी है.
जो तेज जाती है काम पर क्योंकि आठ बजे तक उसे घर लौटना है.
आदमी का खाना बनाने,
बच्चो को दूध पिलाने,
यूँ होती है हर सुबह हमारे आपके आस पास
इसकी खदबदाहटों, गुनगुनाहटों, सरसराहटों
को क्या हम देख-सुन रहे है....?

Thursday, 5 November 2009

स्तानिस्लाव्स्की


स्तानिस्लाव्स्की यथार्थवादी अभिनय की खोज में बहुत बेचैन रहते थे.
अपने आदर्श और मूल्यों को प्राप्त करने के लिए वे किसी भी सीमा तक जाते थे.
ग्रीक नाटक का मंचन करने के लिए वे अपने समूचे अभिनेताओं को एथेंस ले गए थे
और वही एक महीने  रिहर्सल कराई थी,
तो वही गोर्की के नाटक Lower Depth में अपराधी, गरीब और झुग्गीवासियों के जीवन दिखाने
उन्होंने अपने अभिनेताओं को कई दिनों तक वास्तविक रूप से
उन्ही इलाकों में जाकर रहने को कहा था
ताकि अभिनेता उनके जीवन को करीब से देख सकें, महसूस कर सकें.
जीवन के बाद के वर्षों में भरतमुनि का नाट्यशास्त्र पड़ने से
उनकी सोच में आमूल-चूल परिवर्तन भी आया.
Anton Chekhov के Cherry Orchard को सात्विक अभिनय की तलाश में
उन्हें Musical Form में भी करते देखा गया.
नुक्कड़ नाटक हो,
संस्कृत नाटक हो
या यथार्थवादी
किसी भी प्रकार के नाटको में उनकी अभिनय पद्धति हमेशा काम आती है.
एक अर्थो में वे आधुनिक विश्व रंगमंच के पितामह है.
 ऐसे मनीषी और पितामह को शत्-शत् प्रणाम...

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में, आपका दोस्त आलोक

सत्रह हजारी तेंदुलकर


विश्व क्रिकेट के इतिहास में एक स्वर्णिम क्षण जुडा
जब सचिन ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक दिवसीय क्रिकेट में विश्व का पहला ऐसा बल्लेबाज़ होने का गौरव प्राप्त किया है
जिसे छूना किसी अन्य खिलाडी के लिए बहुत दूर कि बात है.

जैसा कमेंट्री करते हुए गावस्कर ने टिपण्णी की
कि तेंदुलकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटरों में अब तक के सबसे चमकदार सितारे हैं.
लिटिल मास्टर का लिटिल ब्लास्टर को ये सम्मान अपने आप में तेंदुलकर कि उपलब्धि दर्शाता है.
विश्व के करोडो प्रशंशको की भांति मैं भी सचिन को बधाई देता हूँ.
वे करोडो भारतीयों के आदर्श है.
निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन में उन्होंने हमेशा शालीनता दिखाई है.
उनकी दीर्घायु और उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाये.

Wednesday, 4 November 2009

Todays thought..!





        






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कौन हो तुम मेरे?


कौन हो तुम मेरे?
कैसे कहूँ?
बस यूँ कहूं ...
जैसे जड़ है आधार वृक्ष का ...
मनुष्य टिका है भावनाओ की ऊष्मा पर ...
जैसे फल से चिपका हुआ होता है छिलका...
शरीर से चमड़ी ...
जैसे रौशनी हो आँखों की  ...
झरना हो सृजन का ...
निर्बाध प्रवाह हो ...
तुम सब हो, सब कुछ हो ...
भावना का आवेग हो ...
अनुभूति की सच्चाई हो...
अनुभव की खान हो...
गुणों का रूपाकार हो ...
गहरे काले अंधियारे में ...
चमकते भोर के तारे हो तुम...
पंछी की चहचाहट हो ...


सुबह का गान हो ...
अरुण की लालिमा हो, चाँद की चांदनी हो ...
भटके हुए के लिए दिशा प्रदर्शक हो तुम...
वृक्ष में रची छाल हो तुम ...




कैसे कहूं?
तुम मेरे कौन हो ...
बस यूँ ही कहूं कि ...

Tuesday, 3 November 2009

रंगमंच क्या है?


रंगमंच क्या है? पीटर ब्रूक के शब्दों में, "ये EMPTY SPACE में पैदा होता है| EMPTYNESS ही स्पेस को जादुई बनाता है|" यहाँ जीवन की भावनाओं के गहरे रंग दिखाई देते हैं, महसूस होते हैं और हमें कहीं भीतर से सोचने को मजबूर करते हैं| क्यूँ नहीं बनता कोई इंजीनियर, डॉक्टर, वक़ील, बिज़नेस मैन या फिर कुछ और? क्यूँ सुनता है वो इस रंगमंच की दुनिया को? सिर्फ इसलिए कि यहाँ देश, देह और काल से मुक्ति मिलाती है| नहीं होतीं जटिल गुत्थियाँ दफ़्तरों की| बाज़ार का मोलभाव नहीं होता और न होते हैं कोई अभाव| होती हैं आँखों में सपनीली परछाइयाँ सृजन की| वन-वन भटकते हुए राम हम ही होते हैं| लंका में दहाड़ते रावण हम ही हैं| कंस के कारागार में पैदा होते कृष्ण हम हैं; तूफानों में भटकते किंग लीयर हम ही हैं| भावनाओं के झंझावात में फँसकर भ्रमित होने वाले हैमलेट भी हम ही हैं| इसलिए चुनते हैं हम रंगमंच की दुनिया को; क्योंकि ये एक जादुई दुनिया है!
प्रतिक्रया की प्रतीक्षा में आपका दोस्त आलोक!

Monday, 2 November 2009

गुरुनानकजी का प्रकाशपर्व!



आज गुरुनानकजी का प्रकाशपर्व है! उनके जन्मदिन पर लेव तोल्स्तोय की एक बात याद आती है, जो ५०० वर्ष पहले गुरुनानक ने कही थी, "बुराई के पास जाने से बुराई बढ़ती है|" इससे सम्बंधित नानक का प्रवचन याद आया और याद आया कि गांधीजी ने तोल्स्तोय से प्रेरणा ली थी| तोल्स्तोय पर बुद्ध का गहरा असर था| सारे अच्छे और महान लोग एक ही बात कहते हैं; क्योंकि सत्य एक है, सहज है, सुन्दर है! तथास्तु!!
आपका दोस्त आलोक

SRK जन्मदिन!

आज शाहरुख़ ४४ वर्ष के हो गए| उनको हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई! वे ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने रंगमंच से शुरूआत कर दूरदर्शन और फिर फिल्मों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया| बिना किसी GOD FATHER के उन्होंने अपना मुक़ाम हासिल किया| आज भी वे अपने थियेटर गुरु "बैरी जौन" को बहुत सम्मान से याद करते हैं| कई शारीरिक चोटों और बीमारियों के बाद भी उनकी ऊर्जा युवाओं जैसी है| वे स्वस्थ रहे और दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करते रहें; यही कामना है! HAPPY BIRTHDAY!!
आपका दोस्त आलोक चटर्जी