ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Thursday, 12 November 2009
जीवन के रंग
आज का दिन भावनाओ से उथल-पुथल भरा दिन है..
आज मेरे बेटे का जन्मदिन है
और वो दूर बडोदरा में है
अभी घर पर सचिन,राज(दोस्त संस्था के रंगकर्मी) और शम्मी (सनी के बचपन का दोस्त)
घर पर केक लेकर आये और हम सबने केक काटकर खाया,
फोन ऑन रखा था,और सनी सेव संवाद हो रहा था
एक अद्भुत,सघन और भावुक क्षण था ..
दूसरी ओरआज से तीन साल पहले आज ही के दिन शाम छह बजे मैंने अपनी माँ को खो दिया था..
एक ओर मेरे बेटे को जन्मदिन कि बधाई
और दूसरी ओर ईश्वर से माँ कि मुक्ति के लिए प्रार्थना..
और इसके बीच में एक पिता और बेटे कि भूमिका में
मै....
और दिन भर विद्यार्थियों,बच्चो,रंगकर्मियों के साथ काम करता
मै....
अपने को देह और कल से मुक्त होता पता हूँ...
जीवन कितना दिलचस्प और रंगों से भरा हुआ है.....
और दो चटख विरोधी भावनाओ के रंग एक साथ,
एक ही दिन,
एक ही क्षण..
उपस्थित होते है .....
इस अद्भुत जीवन को प्रणाम.....
प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में
आपका दोस्त आलोक
(12 नव.सायं ०८:०५)
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