ओ! मस्तक विराट!
अभी नहीं मुकुट,
अभी नहीं अलंकार!
अभी नहीं तिलक,
अभी नहीं राज्य-भार!
एक दिन माथे मेरे,
सूर्य होगा उदीय,
इतना पर्याप्त मुझे अभी!
-कुंअर नारायण सिंह
"एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर."
-मर्लिन ब्रांडो
Thursday, 12 November 2009
क्या मै स्वयं को जानता हूँ ?
क्या मै स्वयं को जानता हूँ ?
नहीं...
क्या जानने की कोशिश करता हूँ ?
हां...
तो क्या पाया ?
यही कि कुछ है ही नहीं कहने को,
कुछ है ही नहीं पाने को...
कुछ पाया सब पड़ा रह जाता है यहीं
हमारे देहान्तर के बाद...
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