ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Tuesday, 17 November 2009
अमिताभ आप औरों से अलग है
विभिन्न किरदारों को विशेष रूप से जटिल चरित्रों को निभाना
किसी भी माध्यम के अभिनेता के लिए एक कठिन चुनौती होता है ..
इस दृष्टि से " ब्लैक " के बाद " पा "
आपके अभिनव,अप्रतिम प्रयासों में से एक है..
मुजे व्यक्तिगत रूप से ऐसा लगता है कि एक अभिनेता के रूप में आप अधिक स्वतंत्र एवं प्रयोगवादी भूमिकाएं अब कर पा रहे है
जो अतुलनीय है..
हालाकि अपने युवा स्टारडम में आपने जो सफलता हासिल की उसमे एंग्रीयंगमैन इमेज के बाहर सफलता नहीं मिली ...
आपने "आलाप" ,"मिली " में अद्भुत अभिनय किया परन्तु वाही इमेज का चक्कर..
परन्तु अब आप डाकू, जिन्न कि भूमिकाएं भी मजे से निभा रहे है ..
एक अभिनेता के रूप में आप चरम आनंद ले रहे है ..
अवश्य ही आपके लिए भी ये अदभुत है साथ ही मुझ जैसे दर्शक जो आपको अपने कॉलेज
और नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के दिनों में सिल्वर स्क्रीन पर राज करते देख रहे है, के लिए अपने आदर्श अभिनेता को प्रयोगवादी जोखिम उठाते देख क्रिएटिव प्लेजर ले रहे है..
मेरी व्यक्तिगत इच्छा है कि शेक्सपीयर के "हेनरी द फोर्ड" पर आप कार्य करे तो एक और सोपान दर्शको के समक्ष आएगा
हालांकि मै यह नहीं जानता कि कमशियर्ली यह प्रस्ताव कितना कारगर हो सकता है..
बांग्ला रंगमंच के प्रख्यात कलाकार "गिरीश घोष" के ऊपर भी आप अदभुत भूमिका निभा सकते है
जिनका अभिनय देखने रामकृष्ण परमहंस आया करते थे..
आप स्वस्थ और सक्रिय रहे
इसी शुभकामना के साथ
आलोक चटर्जी
स्नातक
नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा
पता: H.I.G 101 नर्मदा अपार्टमेन्ट, सेक्टर बी ,सर्वधर्म कालोनी.कोलार रोड,भोपाल(म.प्र.)
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