ओ! मस्तक विराट! अभी नहीं मुकुट, अभी नहीं अलंकार! अभी नहीं तिलक, अभी नहीं राज्य-भार! एक दिन माथे मेरे, सूर्य होगा उदीय, इतना पर्याप्त मुझे अभी! -कुंअर नारायण सिंह "एक्टिंग इज इटरनल जर्नी टु नो द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो
Saturday, 14 November 2009
आज एक आवाज़ सुनी
वो आवाज़ कभी मेरे लिए भी गाती थी
कोई गीत उसने मेरे लिए गाया था
कोई एक नाम भी उसने दिया था मुझे
वो गीत गुम गया है
वो नाम कहीं खो गया है
आज फिर उस आवाज़ में
उस पुराने क्षण को महसूस किया मैंने
अतीत की धुंध में खो गया मैं
संबंधों के मकड़जाल ने
कहीं रिश्ते को जकड लिया
अब एक गहरी उदासी भरी
शाम है
इन्तजार करती आँखें
और कान हैं
एक अनवरत दारुष प्रतीक्षा है....
(१४ नव.०९ दोपहर २:४७)
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good 1
ReplyDeletemight be in the memory of mother
you are an acting teacher plz write abt acting as well actually we want daily column on acting