कौन हो तुम मेरे?
कैसे कहूँ?
बस यूँ कहूं ...
जैसे जड़ है आधार वृक्ष का ...
मनुष्य टिका है भावनाओ की ऊष्मा पर ...
जैसे फल से चिपका हुआ होता है छिलका...
शरीर से चमड़ी ...
जैसे रौशनी हो आँखों की ...
झरना हो सृजन का ...
निर्बाध प्रवाह हो ...
तुम सब हो, सब कुछ हो ...
भावना का आवेग हो ...
अनुभूति की सच्चाई हो...
अनुभव की खान हो...
गुणों का रूपाकार हो ...
गहरे काले अंधियारे में ...
चमकते भोर के तारे हो तुम...
पंछी की चहचाहट हो ...
सुबह का गान हो ...
अरुण की लालिमा हो, चाँद की चांदनी हो ...
भटके हुए के लिए दिशा प्रदर्शक हो तुम...
वृक्ष में रची छाल हो तुम ...
कैसे कहूं?
तुम मेरे कौन हो ...
बस यूँ ही कहूं कि ...

कैसे कहूं?
ReplyDeleteतुम मेरे कौन हो ...
बस यूँ ही कहूं कि ...nice