Thursday, 18 November 2010

सनी - यात्रा पर अग्रसर

सनी बड़ौदा की अण्डर 20 की टीम में आ गया है। प्रीमियर लींग में बढ़िया पर्फोम कर रहा है। अब रणजी में फिर, आईपीएल और फिर टीम इण्डिया, इस यात्रा पर अग्रसर मकतू
जीवन सुन्दर है।

देवउठनी ग्यारस और ईद भी बहुत अच्छा,

देवउठनी ग्यारस और ईद भी बहुत अच्छा, मैं मौत के साय में का शो करके सफलतापूर्वक भोपाल वापस आय़ा। 

सनी का बर्थडे बहुत अहम

इस बार भी दीवाली और 13 नवम्बर को मेरे बेटे सनी का बर्थडे बहुत अहम रहा। 4 साल बाद पूरा परिवार साथ में था। बातें, खाना, पार्टी, पूजा सब साथ। सच अद्भुत।

Wednesday, 10 November 2010

जय रंगमंच

भोपाल लौटा हूं, दो दिन हुए, फिर मुम्बई और पूना। ‘मौत के साये’ में का शो है। फ्लाइट पकड़नी है। भोपाल लौटकर ताम्रपत्र की रिहर्सल में जुटना है। आदि विद्रोह में शो है। जय रंगमंच

चेखव, इबसन, मिलर सब मंच पर जीवित हो उठे।

पिछले दस दिनों से लखनऊ में था, भारतेन्दू नाट्य अकादमी में काम कर रहा था, सुबह 7 से रात 1 बजे तक काम ही काम, इससे अच्छा और क्या हो सकता है।

बीएनए द्वितीय वर्ष के छात्रों के साथ वेस्टर्न रियलिस्टीक वर्क, 2 घंटे का प्रजेन्टेशन ऑडिटेरियम में किया, चेखव, इबसन, मिलर सब मंच पर जीवित हो उठे।


लखनऊ के पास देवा शरीफ गया, सूफी संत वारिश शाह की दरगाह वहां है, बड़ा अच्छा लगा

Monday, 18 October 2010

फिल्म एक्टर्स के साथ नया अनुभव

आज मुम्बई जा रहा हूं, कल से नाटक की ब्लाकिंग शुरु करनी है। फिल्म एक्टर्स के साथ नया अनुभव।

भद्रजन हर कहीं गंदगी और कचरा फैलाने में मशगूल

मैंने कई बार पाया कि हम भारतीय भद्रजन हर कहीं गंदगी और कचरा फैलाने में मशगूल हैं, यह अहसास पिछले दिनों और अधिक पुख्ता हो गया जब बौद्ध (गया) मंदिर में मैंने देखा वहां एक सज्जन हाथ से झाडू लगा रहे थे और दूसरे हाथ से प्रसाद बांट रहे थे। कुछ लोग थूकने में व्यस्त थे। इन सबके बीच राष्ट्रीय समुदाय के पर्यटक अचंभित होकर देख रहे थे कि इस समाज में बुद्ध कहां से आए होंगे या शायद इस समाज के लिए ही बुद्ध का जन्म हुआ हो। नमो: बुद्धाय

Tuesday, 5 October 2010

लगा की यूरोप के किसी शहर में बैठे है.

3 अक्टूबर 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की शुरुहत देखकर लगा नहीं की ये खेल भारत में हो रहे है. यूँ लगा की यूरोप के किसी शहर में बैठे है.

आखिर युवा भारत ने दिखाई परिपक्वता

30 सित 2010 भारत के इतिहास का एक स्वर्णिम दिन, युवा भारत ने राजनीति और धर्म के ठेकेदारों को ठेंगा दिखा दिया. मंदिर मस्जिद के नाम पर अपनी दुकाने चलने वाले सावधान. अब तुम्हारे बुरे दिन शुरू हो गए. आखिर युवा भारत ने परिपक्वता दिखाई

Tuesday, 21 September 2010


मुम्बई के सारे मित्रों को अनंत चतुर्दशी की शुभकामनाएं, दशहरे के बाद फिर मुलाकात होने वाली है।
हम सभी भारतीयों को गौरव का अनुभव करना चाहिए, क्योंकि हमारी मैरीकॉम ने पॉचवी बार विश्व बॉक्सिंग चैम्पियनशीप जीती है, ऐसी स्त्रियॉ हमारे समाज की शान है। सानिया मिर्ज़ा ने क्या किया, क्रिकेट टेनिस और फिल्मों के अलावा हमारे देश धर्म की और राजनीति को इंसाफ मिलता है। अन्य खेल विशेष रूप से भारतीय खेल पुरातत्व के विषय होते जा रहे है।

Monday, 13 September 2010

बाबा प्रणाम

कल शाम को कारंत जी की व्याख्यान माला में गया, ऐसा महसूस होता है कि कारंत जी आज भी हमारे बीच मौजूद है। अपने विद्यार्थीयों के काम में वे प्रतिध्वनित हो रहे हैं। अच्छाई का कोई अंत नहीं होता। परन्तु आज के मीडियोकर थियेटर सीन को देखकर वे क्षुब्ध अवश्य हों, हम अच्छा काम कर सकें यही आशीर्वाद मांगते हैं।

Sunday, 12 September 2010

सुशील कुमार को बधाई, पहली बार किसी पहलवान ने इतिहास रचा, शायद इससे विदेशी खेलो

कि ओर टकटकी लगाकर देखने वालों को देशी खेलों के प्रति कुछ रूचि पैदा होगी। सुशील कुमार देशी व्यायाम से शरीर बनाने वालो में से है। स्टोराइड लेने वाली पीड़ी को इससे सबक लेना चाहिए।

Saturday, 11 September 2010

क्रातिकारी संत तरुण सागर जी से मिला

क्रातिकारी संत तरुण सागर जी से मिला, पहली बार लगा मुनि ऋषि परम्परा के किसी व्यक्ति से साक्षात्कार हुआ। अति शुभ

Thursday, 9 September 2010

पिता

सारे दुखों को,
अपनी मुस्कान में छिपा लेते थे, तुम-पिता!
सारे तनाव, तुम्हारे प्रशस्त ललाट पर ग़ायब हो जाते,
सारी परेशानियाँ,
तुम्हारे सिगरेट के धुँए के साथ
कहीं ग़ायब हो जाती थीं
सारी इच्छाओं का केंद्र तुम थे,
सारी कामनाओं की पूर्ति तुम में थी,
सारा ज्ञान, सारी शिक्षा, सारा जीवन-व्यवहार
परोसते थे तुम किसी स्वादिष्ट व्यंजन की तरह
सारी जानकारी, सारी स्थितियाँ तुमसे परिचालित थीं
तुम्हारे बिना, जीवन की कल्पना नहीं थी
तुम्हारे बिना क्या होगा-
यह सोच ही, पाप भरी लगती थी
ईमानदारी के प्रति तुम्हारी प्रतिबद्धता,
रक्त बन, नसों में बही, पिता!
पर, तुम्हारे बाद सारी दुनिया,
एक खोखले बाजे की तरह लगी,
जहाँ सुनने को बहुत-सी ध्वनियाँ हैं
पर, भीतर कुछ नहीं,
जीवन चल रहा है, चलेगा
                                                      पर, तुम आवाज़ देने पर कहाँ आओगे,
                                                      फिर लौटकर मेरे पास, पिता!

Wednesday, 8 September 2010

अनुभूति!

कितनी भी कोशिशें!
कितने ही प्रयास!!
ढेर सारे प्रयत्न!!
सब वृथा सिद्ध हुए,
जब भी,
मैंने यह कोशिश की थी कि मैं कुछ हूँ,
भीतर से, माँ की कोमल स्नेहिल
लताड़ भरी झिड़की आती-
टूगा! तू बड़ा हो गया है, रे!
और मैं जितना था, उससे और छोटा हो जाता,
आज, देह से अनुपस्थित माँ
फिर कहती है-ख़ुद को छोटा न समझना!
मज़बूत बने रहना!!
और मेरे भीतर एक हिमालय,
आकार लेने लगता है|
                        वो हिमालय, तुम हो माँ!
                        तुम हो, सिर्फ़ तुम हो माँ!
                                         -तेरा आलोक

Sunday, 5 September 2010

Creative और Energatic Experience

FTII Pune में 20 दिन एक्टिंग क्लास लेकर आया हूँ. बहुत Creative और Energatic Experience रहा, विस्तार से फिर

कलाओं का घर भारत भवन!

गतांक से आगे.....
कोई क्रिएटिव बहस, रचनापाठ, नई पुस्तक, संगीत, फिल्म या मेरिंग्स पर चर्चा पर चर्चा करते भी शायद ही कोई मिलेगा|
यदि राज्य सरकार और संस्कृति विभाग चाहे तो भारत भवन को राज्य के संग्रहालय के रूप में विकसित किया जा सकता है| यहाँ मूल इन्फ्रास्ट्रक्चर तो है ही, विभिन्न कला माध्यमों में राज्य के जिन भी कलाकारों ने योगदान दिया है, उनके जीवन-परिचय, कृतित्व,फोटोग्राफ़्स, सीडी-डीवीडीज, को संकलित कर एक प्रदर्शनी में बदला जाए| चुनिन्दा संग्रह की एक टूरिंग प्रदर्शनी भी बनायी जा सकती है जो विभिन्न महोत्सवों में, अन्य राज्यों में, मध्यप्रदेश का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व कर सकती है| राज्य संग्रहालय नाट्य एवं लोक कलाओं के साथ नृत्य व संगीत की फिल्म बनाकर उनका एक राज्य स्तरीय समारोह किया जा सकता है, जिसमें दूसरे राज्यों के प्रतिनिधि भी शामिल हों ताकि प्रदेश के कला गौरव को व्यापक परिदृश्य पर स्थापित किया जा सके|
       मध्यप्रदेश की लोक, नागर, आधुनिक कलाओं को सहेजने और एक जगह प्रदर्शित करने में राज्य संग्रहालय अपनी एक विशिष्ट भूमिका निभा सकता है| मध्यप्रदेश कला गौरव नाम से एक राष्ट्रीय कला पुरस्कार मूल रूप से मध्यप्रदेश के कलाधर्मी को दिया जा सकता है| यह शिखर पुरस्कार से भिन्न हो|
      प्रदेश के कलाकारों का जीवन-परिचय विवरणी, डाक पता, दूरभाष, ई-मेल और वेबसाइट राज्य संग्रहालय के पास होना चाहिए| और एक कला माध्यमों की निर्देशिका भी प्रकाशित करनी चाहिए| एक  मासिक कला पत्रिका, जिसमें प्रदेश भर के कलाधर्म की जानकारी हो, का प्रकाशन बांछ्नीय है| कलावार्ता अपने दायित्व में विफल हो गयी है|            
    विभिन्न कला माध्यमों पर प्रत्येक पंद्रह दिन में एक संगोष्ठी का आयोजन होना चाहिए, इससे बौद्धिक विकास को गति मिलेगी एवं सूचना के तर्कशील आदान-प्रदान की गुंजाइश बनी रहेगी|
      यदि भविष्य में, मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय या रंगमंडल की स्थापना होती है तो यहाँ के तीनों प्रेक्षागृहों का प्रयोग प्रशिक्षण और प्रदर्शन हेतु किया जा सकता है| इस तरह संग्रहालय मात्र जड़ न होकर प्रवाहशील बना रहेगा|
हमारे और देश के अन्य भागों के कलाधर्मियों के लिए यह एक कलातीर्थ के रूप में विकसित होगा, जहाँ मात्र दर्शक या कलाकार ही नहीं, बल्कि कला-शोधार्थी के लिए भी यह एक महत्त्वपूर्ण केंद्र होगा|
      और अंत में, आज दुनिया के आधुनिक और विकसित देशों की तो बात ही छोड़ दें तो भी इरान, ईराक, टर्की और मिस्र जैसे देशों में भी नेशनल आर्ट यूनिवर्सिटीज़ हैं, पर हमारे यहाँ पुरातत्त्व संग्रहालय तो है पर ज़िंदा, जाग्रत व सक्रिय राज्य कला संग्रहालय अभी भी एक कल्पना या विचार मात्र है!

Sunday, 29 August 2010

कलाओं का घर भारत भवन!


 कहने को तो भोपाल में कलाओं का घर भारत भवन है, परन्तु अब लगता है यहाँ की कलाएँ तो पता नहीं कहाँ हैं या गयीं घर एक सुनहरे अतीत की भुतहा याद लिए अवशेष के रूप में बचा है| आज की युवा पीढ़ी और दर्शकों को यह जानकार  शायद किंचित आश्चर्य हो की पच्चीस साल पहले जब भोपाल बहुत छोटा शहर था] शहर के इने-गिने रंग समूह थे और शायद तीन अखब़ार जिनमें कोई कला समीक्षक भी नहीं होता था, न ही प्रत्येक प्रस्तुति की रंगीन तस्वीर छपती थी, तब भी भारत भवन में एक साथ एक समय तीन नाटकों के मंचन का प्रयोग किया गया और तीनों प्रदर्शन अन्तरंग, तलरंग और बहिरंग में हाउसफुल थे| यह ध्यान रखने की बात है की प्रत्येक दर्शक टिकिट लेकर ही प्रवेश करता सकता था| यहाँ तक की अभिनेताओं के परिजन भी टिकिट खरीदकर नाटक  देखने आते थे| भारत भवन का मंच पाना तब  मात्र प्रतिष्ठित कलाकारों के ही बूते की बात थी| यदि उस समय के आमंत्रित कलाकारों की एक सूची बनाई जाये तो उसमें पं. रविशंकर, पं. बिरजू महाराज, केलूचरण महापात्र, पीटर ब्रूक, शंभू मित्रा, असगरी बाई, गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी, पु. ल. देशपांडे, तापस सेन, व्. राममूर्ति, अनंतमूर्ति, गिरीश कर्नाड, अज्ञेय, रघुवर सहाय, तक के नाम मिलेंगे| स्पष्ट है उस समय कला प्रदर्शन के मापदंड क्या थे?
पिछले कुछ वर्षों से भारत भवन एक ऐसी जगह बन गया है जहां कोई भी किराया देकर अन्तरंग में अपना प्रदर्शन करवा सकता है| यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए| लेकिन एक मेरिट तो जीवन के हर क्षेत्र में तय करनी होती है, नहीं तो स्थान की गरिमा भी चली जाती है| आज भारत भवन की केन्टीन में जाकर देखें| जहाँ कभी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों का जमघट लगा रहता था, वहाँ सुबह से ही स्थानीय रंगकर्मी बैठकर गपियाते रहते हैं, यहाँ क्रिएटिव बातें कम,  परनिंदा और बेवजह टाँग-खिंचाई ज़्यादा होती है| चूँकि मीडिया के बंधुगण भी कवरेज हेतु भारत भवन नियमित रूप से आते ही हैं सो उनसे मिलने और संपर्क स्थापित करने के लिए भी केन्टीन का प्रयोग होता है| ........... क्रमश:

Friday, 6 August 2010

पर, माँ, माँ होती है!


दुनिया के लोग खरबों हैं,
उतनी ही भावनाएँ, विचार, द्वंद्व,
उतना है संघर्ष, सफलता-असफलता भी,
एक से दूसरे होते ही हम, भीतर से बदल जाते हैं,
पर दुनिया में, एक चीज़ ऐसी भी है,
जो कभी नहीं बदलती!
जानवरों को देखा, इंसानों को भी,
पशु-पक्षियों को भी,
पर एक समान है सभी जगह,
माँ का व्यवहार!
अपने बच्चे को दूध पिलाती!
चोंच से दाना चुगाती!
जीभ से चाटकर प्यार से सहलाती!
अपने पैरों के बीच, सुरक्षित रखती बच्चे को,
गोद लिए बच्चे को,
संकट के कारण छटपटाती,
अपनी संतान के लिए,
उसके सुखद जीवन-भविष्य की कामना,
निस्वार्थ भाव से करती|
वो माँ होती है-चाहे किसी की भी हो
कहीं भी हो, कैसी भी हो संतान!
पर, माँ, माँ होती है!

कुछ ऐसा ही है, हाल यार!

हम सब कितना दूर होते हैं,
जब सबसे निकट-पास होते हैं|
पाने का अर्थ,
खोने के अहसास के बाद आता है|
बहुत शोर के बाद, खामोशी,
अपनी बात भी कह जाती है चुपचाप|
चुप होकर भी हम कितना बोल जाते हैं|
देखकर भी नहीं देखते,
और देखकर, देखने में ही खो जाते हैं,
पर देखते सचमुच फिर भी नहीं|
कुछ ऐसा ही है, हाल यार!
अपना और दुनिया दोनों का,
और दोनों को ही गुमाँ है, और यकीन भी
खुद के समझदार होने का!!

कहाँ हो तुम?

कहाँ हो तुम?
कहीं से भी नहीं आती ध्वनि तुम्हारी,
कोई संपर्क नहीं
तुम्हारा चेहरा कैसा दीखता होगा अभी,
मेरी स्मृतियों में सब धुंधलाता जा रहा है,
बची हैं शेष,
मात्र बचपन, किशोरावस्था की स्मृतियाँ!
यौवन की दहलीज़ पर क़दम रखते तुम
बहुत आकर्षक थे,
विवाह और पिता बनने के बाद
मुझे तो कम-से-कम तुम ग्रेसफुल लगते थे
पर अभी इस वक़्त कैसे हो तुम?
कोई ध्वनि भी नहीं,
मात्र मौन भयानक-सा
मेरे साथी, दोस्त, बड़े भाई, गौतम दादा!
कहाँ हो तुम?

Monday, 2 August 2010

स्मरण

जब आऊँगा, इस देह को छोड़,
सीमांतों, क्षितिजों के पार,
मुक्त होकर संसार से-
तुम्हारे पास|
क्या तुम पहचान लोगी माँ?
जैसा, तुम लाई थीं- मुझे - पवित्र-निश्छल
इस संसार में|
मैं था, तुम्हारा ही एक और विस्तार!
पर दुनिया में, फिर मैं मासूम कहाँ बचा?
मैंने याद किया है, हमेशा पाया है, महसूसा है तुम्हें
मैं तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊँगा माँ?
माँ.........माँ.............माँ..........!
क्या तुम मुझे पहचान पाओगी?
जब आऊँगा इस देह को छोड़, सीमांतों के पार
तुम्हारे पास, क्या तुम मुझे पहचान पाओगी,
                                                      माँ?
                                                      -aalok chatterjee

Wednesday, 24 February 2010

क्या बात है MP ROCKS


हमें मध्यप्रदेश का निवासी होने का कितना गर्व है? क्या हम सचमुच अपने प्रदेश, अपनी मिटटी से प्यार करते है? शायद हममे से अधिकांशतः लोग यही कहेंगे की "हाँ है.."  परन्तु सवाल यह उठता है की किस बात पर हम गर्व या प्यार करते है? आज के युवाओ से बात करने पर एक निराशाजनक स्थिति उभरती है, वे अपने प्रदेश और इतिहास और परम्परा से परिचित ही नहीं है. जबलपुर के युवा हरिशंकर परसाई और ज्ञानरंजन, रामचंद्र शुक्ल जानते ही नहीं, पढ़ने का सवाल ही कहाँ उठता है. रीवा के लोग नहीं जानते की बीरबल सीधी से रीवा आये थे और रीवा से तानसेन को ग्वालियर रजा ग्वालियर ले आये थे. अधिकांश तो यह भी नहीं पता की शिवमंगल सिंह सुमन उज्जैन रहे और देवास कुमार गन्धर्व की कर्मस्थली थी. प्रसिद्ध नाटककार भवभूति ग्वालियर के पास पवई के थे और भोपाल के कितने युवा शंकर शेष, शरद जोशी और राजेश जोशी को पढ़ते है? बड़ा तालाब किस समय बनाया गया और बेगमों ने नारी शक्ति के रूप में भोपाल की सियासत संभाली. ये विस्तार से युवा नहीं जानते. संस्कृति से जुड़े लोग रोज़ रविद्न्रा भवन में आते है पर यह कब बना, इसका टेक्नीकल ग्राउंड प्लान, स्टेज, लाइट उपकरणों के बारे में उन से पुच कर देखिये तो वे शर्मिंदगी महसूस करेंगे पर बता शायद ही पाए. हमारे यहाँ राष्ट्रीय हिंदी अखबार ही लोग नहीं पढ़ते तो विचार करें कितने लोग अंग्रेजी अखबार पढ़ते होंगे. तो फिर ये प्राइवेट इंजीनियरिंग, पेरामेडिकल कोर्स वाले ढेरो कालेजो में पढ़ने वाले, पढ़ाने वालों का स्तर क्या होगा? शहर के एलिट स्कूलों में भीं छोटे शहरों के बांके लोग पढ़ते-पढ़ाते है तो व्यावसायिक प्रतियोगी परीक्षाओं में हमारा मध्यप्रदेश कहाँ होगा. शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल पब्लिक यूरिनल जैसा है? जहाँ टीचर के घर के बच्चे रोज़ न्यूज़ नहीं सुनते तो फिर बाकि बच्चों का क्या? एक अच्छा कम्युनिटी हाल, एक प्राइवेट प्रेक्षागृह ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा. थूकने, गुटका खाने में अक्सर मिल सकता है. भोपाल मेले में पापड़ , बड़ी, अचार, कपडे, ड्राइगरूम असेसरी मिलेगी पर किताबें, वो भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की, भूल जाइये ये मरीचिका साबित होगी. ट्राफिक सेन्स में महिलाये के साथ सार्वजनिक स्तर पर व्यवहार में हम अभी भी मध्य युगीन ही है और कहते है - हमारा स्वर्णिम मध्यप्रदेश. क्या बात है MP ROCKS

Monday, 22 February 2010

तुम हो, तो हूँ, मैं.

तुम हो, तो हूँ, मैं
याद में तुम हो
सुख-दुःख में तुम हो.
दूर होकर भी पास हो तुम
एहसास है मुझे अपने फासलों का
गमो का भी, हैसियत का भी.
पर क्या करूँ, एक लम्बा, ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार है.
तुम हो, तो हूँ, मैं.

उमंग और उत्साह ही स्रजनात्मक ऊर्जा है.

जनवरी फ़रवरी 2010 बहुत व्यस्त रहा. जनवरी 26 को शहडोल में आजाद का बहुत अच्छा शो हुआ. दर्शक खचाखच थे और नाट्य प्रस्तुति को उन्होंने बहुत उदारता से ग्रहण किया. फिर 30 से 3 तक वर्धा में था. सेवाग्राम नाम से एक टेलीफिल्म बनाई जो गोवा फिल्म फेस्टिवल में जाएगी. फिर 4 फरवरी को उज्जैन में मेरा सम्मान था और ऐसा ही होता है का शो भी. अशोक वाजपेई और पियूष भाई आये थे, अच्छा लगा. 6 फरवरी से ग्रीन वैली स्कूल में काम शुरू किया. और आज २२ फरवरी रविन्द्र भवन में बच्चे आजाद प्रस्तुत कर रहे है. साथ ही ग्रुप में जसमा ओढ़न पर काम शुरी हुआ है. मार्च में उड़ीसा जाना है. मई में लखनऊ बीच में काठमांडू भी जाना है. मेरे सात आर्टिकल छप गए है. उत्साह लग रहा है. उमंग और उत्साह ही स्रजनात्मक ऊर्जा है.

Tuesday, 12 January 2010


 कल  अवतार फिल्म देखी.मुझे फिल्म कि  टेक्नोलोजी और भव्य इफेक्ट के  बीच बहती मानवीय संवेदनाओ और भावनाओ के सूक्ष्म मिश्रण ने लगभग चमत्कृत कर दिया .सुना है कि कैमरोन ने 1995 मै इसकी पटकथा का प्रारूप तयार किया था .इससे लगभग सात ड्राफ्ट तैयार हुए ,इतनी विस्मृत पटकथा .सिर्फ बड़े बजट से ही बड़ी फ़िल्मे सार्थक फ़िल्मे नहीं बनती.मानवीय से परे का संसार पेन्डोरा  गृह दिखलाने में निर्देशक  का अहम् योगदान है .सबसे महत्वपूर्ण है -प्यार ,उससे उपजी ताकत ,और स्वयं को शक्तिमान समझने  वालो को योद्धा की भांति  धूल चटाना,जीवन धर्म और एक्टिव लाइफ को रेखांकित करता है .अंत में जैक का अवतार के रूप में  रह जाना और पंडोरा पर अपने प्यार के साथ एक नया जीवन रूपक रखने को तैयार  मानव एक नए रूपाकार में .                                                   
                                                                                   सचमुच ही अदभुत फिल्म. मेरी तरफ से रस्सी कलाकारों ,टेकनिसियन,स्टाफ ,निर्देशक और पूरी टीम को असंख्य बधाइयाँ  और शुभकामनाये .                                                      दोस्त आलोक                                                                                                                                                            11 :08am                                                                                                                      

चिंता

आज चारों ओर मिडियोक्रेसी इतनी बढ़ गयी है कि समाज का कोई भी पद उससे अछूता नहीं रहा .सबसे दुखद पहलू  तो यह है कि समाज के उच्चतम मानकों एवं मूल्यों वाले  क्षेत्र पर भी इसकी  छाया  पड़ रही  है.शिक्षा,स्वास्थ्य ,कला ,पत्रकारिता,न्याय ,विधि ,प्रशासन  ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जो अपने नैतिकता के उच्च मानदंडो पर खरा उतरता  हो.दूसरे दर्जे के और दोयम स्तर के लोगो को इतना अधिक महत्व हर स्तर पर मिलता है कि सच्चे लोग कई बार स्वयं को हतप्रभ पाते  है.मिडियोक्रेसी का दायरा इतना बड़ा है और उनकी नेटवर्किंग इतनी अच्छी है कि गूगल का सर्च इंजिन भी शर्मा जाए .कमीशनखोरी आज इतनी है कि उच्च पदों पर बैठे लोगे भी बेशर्मी से  अपने उपरवाले का हवाला देते हुए कमीशन मांगते है .सरकारी पैसे का दुरूपयोग देखना हो तो सरकारी संस्थानों को देखिये .जहा बिजली,फ़ोन,चाय,कागच.पेन का एक दिन का खर्चा ही एक परिवार के पेट भरने को काफी होगा.उच्य पदों पर आज काबिल व्यक्ति कम है बल्कि राजसत्ता के गलियारों में घुमने वाले अवसरवादी व्यक्ति अधिक है जो पदों पर बैठकर उनका एवं स्वयं के परिचितों का उद्धार करने मै जुट जाते है.एक अच्छा शिक्षक,एक अच्छा डॉक्टर या इंजिनियर,कलाकार ,पत्रकार ,वकील या कलेक्टर आज कि व्यवस्था में क्या करे , मात्र इतना ही कि वह स्वयं को भ्रस्टाचार मै लिप्त न करके अपना काम ईमानदारी से करे.पर वहा भी उसे प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा.वह दूसरो के लिए लाभप्रद नहीं रहेगा सो उसे परेसान किया जायेगा. एक नई सामाजिक क्रांति ही इसका एकमात्र विकल्प है पर वह क्रांति और परिवर्तन पूर्ण रूप से अहिंसक ,मानवतापूर्ण ,एवं कल्याणकारी होनी चाहिए . दोस्त आलोक 10:55 am bhopal

Sunday, 10 January 2010

कला साधना सम्मान

आज 2009 जनवरी कि आठ तारीख को जबलपुर में मुझे परसाई रंग सम्मान मिला था और 2009 के अंतिम माह दिसंबर कि 25 तारीख.


यानि आज भोपाल में कला परिषद् मुझे कला साधना सम्मान शाम 4 बजे देने वाली है. 


थियेटर करने कि चीज़ है 
तब समझ आती है ज़िन्दगी 
और ज़िन्दगी के मायने...


ईश्वर, माता-पिता और कारन्त बाबा को प्रणाम 


आलोक 
10.30 AM, BHOPAL

X-MAS


प्रति वर्ष कि भांति आज भी 25 दिसंबर है क्रिसमस का दिन. दुनिया के अरबों ईसाई भाई बहन बच्चों को मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाये. करुणावतार क्राइस्ट आज दुनिया में आये थे हमें अहिंसा, इंसानियत, प्यार का सन्देश देने. जात पात, छुआछूत से ऊपर विश्वमानव, विश्वसमाज कि एक वृहद दृष्टि उन्होंने दी थी. ईसा का सन्देश बाद के समय में बुद्ध, महावीर, लाओते, कंफ्युशियन के काल में भी गुंजित हुआ. आज जब पूरी दुनिया वैश्विक आतंकवाद से पीड़ित है, ईसा और भी प्रासंगिक लगते है. 


ईसा कि आवश्यकता आज और अधिक लगती है. जिन्होंने स्वयं कष्ट, पीड़ा सही, दूसरों कि खातिर ऐसे त्याग कि मूर्ति को प्रणाम. 


दोस्त आलोक 
10:15 AM : Dt. 25.12.2009
Bhopal (MP)