Thursday, 17 December 2009

जीवन नाम है नित नयेपन का

जीवन नाम है नित नयेपन का.
स्फूर्ति, ऊर्जा, सकारात्मक सोच का मिश्रण ही जीवन को सुन्दर बनता है.
किसी क्रिएटिव इंसान के लिए ज़रूरी है कि वो अपने ऊपर संतुष्टि कि जंग कभी न लगने दे.
2009 समाप्त होने को है तो मैने 2010 के लिए नया कुछ करने की सोची है.
बांग्ला और मराठी में पाठ परम्परा काफी पहले से उपस्थित है.
बांग्ला में तो नाटकों का पाठ सुनने का भी टिकट खरीदकर लोग आते है.
लेकिन हिंदी में पाठ का अर्थ कवि सम्मलेन है जहाँ कुछ लोग अपनी कविताये पढ़ते है.
दरअसल शब्दों की मूल ध्वनि को पकड़ना, ध्वनि में छिपे अर्थ को उदघटित करना और
व्याख्यात्मक बिम्ब उत्पन्न करना, ये सब पाठ परंपरा की अनुस्युत और छिपे संस्पर्श है.
शब्दों का सही उच्चारण हमें उसमे छुपे भावनात्मक आवेग Emotional Force को पकड़ने में मदद करता है.
और रचना का सही पाठ एक निश्चित देह्गति और देहभाषा को भी प्रकट करता है.
 चेहरे का सही भाव,भाषा,देह्गति मिलकर एक पूर्ण अर्थ को प्रकट ही नहीं करते वरन संप्रेषित भी करते है.
यह पूर्ण व्यक्तित्व निर्माण है..

इसीलिए सोचा प्रत्येक शनिवार में कुछ निश्चित श्रोता, दर्शक के सामने हिंदी में कविता, कहानी,नाट्य गीत, नाट्य संवाद पर पाठ प्रस्तुत करूं.
युवा पीढ़ी के लिए यह साहित्य, नाटक, कविता से साक्षात्कार के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास से भी इसे जोड़ा जाएगा..
राकेश दीक्षित,राजेंद्र कोठारी और मैंने एक दोपहर new market कॉफ़ी हाउस में बैठकर
भोपाल नगर निगम की चुनाव चर्चा के बीच यह तय किया कि
भोपाल में जितने प्राइवेट शिक्षा संस्थान है उनके विद्यार्थियों को भी इसमें शामिल किया जाए..
कला जगत कि विशेषकर हिंदीभाषी पट्टी कि यह समस्या हमेशा रही है कि
दूसरो से संवाद न कर अपनी ही दुनिया में उलझे रहते है ..
समाज-समाज कि बातें तो बहुत करते है परन्तु समाज से जुड़ते कितना है..
 नए दर्शक भी हम नहीं तलाशते बस जो भारत भवन, रवींद्र भवन आता है वही हमारा दर्शक है..
क्योकि नहीं रंगमंच समाज के हर कोने तक पहुँचता हैं ,यह अपने श्रेष्ठ होने के अहंकार मैं मेंढक सा कुए में घुसे रहता है..
और दिखने वाले आसमान को ही अपनी दुनिया मानता समझता है..

होश मैं रहकर गाफिल रहना कोई हम रंगकर्मियों से सीखे
हम युवा पीढ़ी को संस्कारित करने और कलाक्षेत्र में लाने के लिए क्या कर रहे है ..

फिल्म और टेलीविजन ने थियेटर को ख़त्म कर दिया है.
दर्शक छीन लिए ऐसी घोषणा करने से रंगमंच का कोई भला नहीं होने वाला.
अच्छी फिल्म और टीवी के सामने हमारी तैयारी क्या है.
नए दर्शक आयें और नियमित रूप से जुड़े. ऐसी कौन सी योजना या ब्लू प्रिंट रंगकर्मियों के पास है.
प्रडक्शन ग्रांट से नाटक कर लेने से खुद का बायोडाटा ज़रूर बनता है
पर युवा रंगकर्मी के लिए शोध, प्रशिक्षण, पुस्तकालय, पत्रिका, डायरेक्ट्री
जैसी सुविधाओ के लिए हमेशा सरकारी मदद या ग्रांट कि अपेक्षा होती है.
पर स्वयं कि कार्यप्रणाली क्या हो यह भी विचारनीय है.
बहरहाल 15 दिसंबर वैशाली काम्प्लेक्स शाम 6.30 पर आये
आपको निराला, मुक्तिबोध, बच्चन, रघुवीर सहाय और अज्ञेय कि कविताओं का रसास्वाद मिलेगा.

परिपत्र में

दोस्त आलोक
10.29AM

Sunday, 13 December 2009

बच्चों, तुम कितने समझदार हो

बच्चों, तुम कितने समझदार हो
कितने प्यारे हो

तुम बच्चों ने Sound of Music में रंग भरे
भगत कि गत बनाई
बच्चों तुमने एम्फी थियेटर में
कला के सच्चे रंग बिखेरे

Recorded Track पर तुमने
अभिनय किया यूँ,
कि पारंगत अभिनेता भी
चकरा जाये
चकमा खा जाये

बच्चों तुम्हारा आभारी हूँ
हमेशा के लिए
मेरे जीवन में यूँ ही बने रहना
संस्कार वैली के बच्चों
तुम्हारा जीवन शुभ हो

तुम खुशियों के आसमान नापों
सृजन के नए शिखर छुओ
सच्चे उत्तराधिकारी बनो
भारतीय मानव समाज के

शुभकामनाओ के साथ
तुम्हारा आलोक अंकल

हजारों जिंदगियां खामोश




आज 3 दिसंबर 2009  है. आज से ठीक पच्चीस वर्ष पहले भोपाल में विश्व कि अब तक कि सबसे भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई थी. यूनियन कार्बाइड कि फैक्ट्री से निकली ज़हरीली गैस ने हजारों ज़िन्दीगियों को खामोश कर दिया तो हजारों ऐसे भी है जो जिंदा तो है पर लाश कि तरह. उस वक़्त जो बच्चे दुनिया में आने को थे वह तरह - तरह कि बीमारियों का घर बन गए. हर बरसी पर मोमबत्ती जलना, मशाल प्रदर्शन और दो दिन चर्चा यही बचा रहा है. आज तक सच्चे हकदारों को मुआवजा नहीं मिला या न के बराबर मिला, वही प्रभावशाली लोगों ने तिगुना तक बना लिए. दवाओ के लिए तरसते बदहाल, बीमार आज भी बैंक में भटकते है और उनके लिए आई दवाइयां भी उन्हें न मिलकर कहीं और बिक जाती है. भोपाल कि चमचमाहट, विकास के पीछे एक चेहरा ये भी है.
बड़े व्यवसायी घरानों को इस बारे में कुछ ठोस कर दिखाना चाहिए. समाज में ही तो व्यवसाय है. समाज उन्नत, खुशहाल, स्वस्थ नहीं रहेगा तो अंततः इसकी क्रय शक्ति पर भी असर पड़ेगा जो अंततः आर्थिक रूप से समृद्ध कार्पोरेट घरानों को चुकाना होगा. अतः बेहतर है कि उत्पाद पर होने वाले प्रमोशनल खर्च को कम कर उसका एक अंश भोपाल के वास्तविक गैस पीड़ितों और परिजनों को मिले यही उनके प्रति हमारी सच्ची विनम्र श्रृद्धांजलि होगी और उनके जीवित परिजनों को मानवीय सहायता भी.

इसी आशा के साथ.
दोस्त आलोक





जीवन में पूरा अंधकार नहीं होता



जीवन में पूरा अंधकार नहीं होता. आशा और उम्मीद कि एक लौ जगी रहती है. बुरी से बुरी स्थितियों में भी कोई एक क्षण घटित होता है और पता नहीं कहाँ से, कैसे, किससे मदद मिल जाती है. काम हो जाता है. तब प्रकृति कि उदारता और ईश्वर का महत्व समझ आता है. आज में यह मानता हूँ कि एक एक्टर को एक अच्चा खिलाड़ी, रसोइया, वैज्ञानिक समझ वाला एवं अध्यात्मिक चेतना वाला व्यक्ति होना चाहिए. रसोइया विभिन्न मसालों को अलग अनुपातों से मिलकर, काटकर, भुनकर, तलकर स्वादिष्ट व्यंजन बनता है तो वैज्ञानिक अपनी तर्क बुद्धि और विश्लेषण से जीवन को गतिमान, सुविधाजनक, प्रगतिशील बनता है. खिलाडी एक अदभुत मानवीय जीवटता से भरा हुआ होता है जो अपनी लय, क्षमता को स्फूर्ति से जोड़कर उसे टीम वर्क में बदल देता है और सामूहिक प्रयासों में भी एकल प्रयास अलग दिख भी जाता है. वैसे ही एक अभिनेता आलेख से चरित्र को छांटकर, चिन्तन, विश्लेषण करता उसे दूसरों के साथ टीम वर्क में बदलकर अलग-अलग मनोभावों को मनोवैज्ञानिक सत्य और मानवीय व्यवहार, प्रतिक्रियाओं से भरकर एक जटिल आवेगपूर्ण ओजस्वी सृजनात्मक क्षण मंच पर रचना है जिसे हम अच्छा अभिनय कहते है.
अध्यात्म एक निरंतर व्यक्तित्व अंतर्क्रिया है जो व्यक्ति को मनुष्यत्व, इंसानियत से जोडती है. इससे व्यक्ति के रूप में अभिनेता का निखर ओर उभर कर आता है ओर वह एक इन्सान के रूप में मनुष्य समाज, जीवन दर्शन के बेहतर ढंग से जोड़कर समझ पाता है एवं जीवन आचरण में आत्मसात करने कि कोशिश करता है.

Wednesday, 2 December 2009

लियो तोल्स्तोय की कहानियाँ: "धर्मपुत्र" एवं "प्रेम में ईश्वर"!

एक दिसंबर को लियो तोल्स्तोय की दो कहानियों  "धर्मपुत्र" एवं "प्रेम में ईश्वर" का मंचन भारतीय रंगमंच पर पहली बार "दोस्त" ने कला अकादमी, भोपाल में किया|

             ऐसी सरल मानवीय एवं करुणात्प्रेरक कहानियों से मेरा पहली बार सामना हुआ| हालाँकि इससे पहले विभिन्न रचनाकारों की सौ से ऊपर कहानियाँ मैं पूर्व में भी कर चुका हूँ; लेकिन जीवन की छोटी घटनाओं से गहन सत्य की खोज, मानवीय व्यवहार में ही ईश्वर का साक्षात्कार प्रतिक्षण प्रेम द्वारा करना; इनको मंच पर प्रस्तुत करना एक चुनौती थी| परन्तु दर्शकों ने भावविभोर होकर प्रस्तुति देखी एवं स्वयं को कहानियों में महसूस करते हुए अपनी जीवन कहानी को उसमें देखा; अनुभूत किया; ये बड़ी बात है| दर्शक कम थे परन्तु दुनिया में समझदार कम ही होते हैं और इससे उनका महत्त्व भी समझ आता है| दर्शकों में पत्रकार, विद्यार्थी, शिक्षक, घरेलू लोग और रंगमंच से जुड़े लोग थे और आश्चर्य यह कि मंच पर उपस्थित कलाकारों का प्रतिनिधित्व भी इन्हीं वर्गों द्वारा हो रहा था| कारंतजी कहते थे- रंगमंच सामूहिक तो है ही सामुदायिक भी यानी कम्युनिटी ओरिएंटेड भी होता है और इसी में रंगमंच की ऊर्जा और चेतना निहित है| समय: १०:४७ प्रात: |
दोस्त आलोक

Saturday, 28 November 2009

बाबा के नाम



आज 26 नवम्बर 2009 को
मेरी रंगयात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव.
मध्यप्रदेश में पहली बार
कोई नाटक पूरी तरह से
ऑडियो ट्रैक पर अंग्रेजी भाषा में
रंगमंच पर खेला जायेगा.

साउंड ऑफ़ म्यूजिक ब्राडेव का मशहूर म्यूजिकल है.
इसमे औदेर एअर एम्फी थियेटर में
बदलते फ्लेक्स सेट और संगीतबद्ध
कोरियोग्राफी के साथ
संस्कार वैली स्कूल के बच्चो के साथ कर रहा हूँ.

इसके पहले टैगोर कि तोता कहानी,
प्रेमचंद का ईदगाह, व्यास का उस्मंगम कर चुका हूँ.

पर ये नया रंगानुभव है मेरे लिए भी.
साथ ही मध्यप्रदेश और भोपाल के रंगमंच के लिए.

इसी भोपाल में कारन्त जी ने मेरी रंगदिक्षा कि थी.

कारन्त बाबा तुम्हें प्रणाम...
आज गुरुवार है..

गुरूजी अपने आलोक को आशीर्वाद दीजिये....

और मेरा प्रणाम स्वीकार कीजिये.


बाबा आपका ही.
आलोक

शहीदों के नाम ये पाती ...




आज 26 नवम्बर है. 
एक वर्ष हो गए, 
"मुंबई ताज" पर आतंकवादी हमले को. 
उन शहीदों के नाम ये पाती ...


तुम न होते तो क्या होता?
तुम आये देवदूत बन
सबने देखा तुम्हें हेलीकाप्टर से उतरते
हवा में रस्सी से लटकते हुए
तुमने आपना खून दिया
तुमने अपने परिवार को छोड़ा 
दुसरो को बचाया
खुद न डरते हुए - रक्त आरक्त शरीर लिए
डरे हुए को संभाला 
तुम ईश्वर के भेजे दूत हो
आये हो हम पापियों कि रक्षा करने
सभी शहीदों को प्रणाम
एवं उनके परिवारों को जय हिंद 


दोस्त आलोक 

Tuesday, 17 November 2009

कला माध्यमों में एक अभिनेता की जीवन और मृत्यु



एक अभिनेता वास्तव में क्या चाहता है? यही कि उसे हरेक प्रकार कि चुनौतीपूर्ण भूमिका मिले और वो उन्हें सफलता से निभाए. परन्तु होता क्या है कि फिल्म, टीवी, रंगमंच तीनो माध्यमो में ही वो प्रारम्भिक मेहनत और सफलता के आधार पर वो एक इमेज या टाइप में बदल जाता है. बाद के वर्षो में वो उसे ही दोहराता रहता है. फिल्म में यह सबसे जल्दी होता है क्योंकि स्टार बनने के लिए इमेज चाहिए जैसे ही-मैन, एंग्रीयंगमैन, जम्पिंग जैक, लवर बॉय, एंटी हीरो, ये सब दरअसल ब्रांडिंग है. इसी आधार पर कथानक रचे जाते है और चीजों का भावुकता भरा अतिरेक चित्रण होता है. यह एक फंतासी को जन्म देता है जो दर्शकों के जीवन के यथार्थ से सतही तौर पर जुड़ते हुए एक काल्पनिक संतुष्टि देता है. जिस प्रकार के सीरियल आज चार रहे है उनमे अभिनय और अभिनेता के लिए बहुत अधिक कुछ नहीं है. वर्षों तक हिंदी रंगमंच कि शीर्ष अभिनेत्री थीं सुरेखा सीकरी और उत्तरा बावकर ने रंगमंच कालिदास से लेकर चेखव, मन्नू भंडारी, मोहन राकेश, शेक्शपियर और ब्रेख्त के नाटको में अत्यंत चुनौतीपूर्ण भूमिकाए निभाई परन्तु टीवी पर देखी बालिका वधु और जस्सी जैसी कोई नहीं जैसे सीरियलों में सास और दादी कि भूमिका स्टारडम हासिल की. परन्तु उन जैसी स्तर कि अभिनेत्रियों के लिए उसमे अभिनय की जटिल संभावनाए कितनी और कहाँ है? रंगमंच पर तुगलक और लुक बेक इन एंगर में कठिन भूमिकाओ का वर्षों तक निभाने के बाद मनोहर सिंह फिल्मों में धूर्त संपादक, चालाक नेता जैसी भूमिका में टाइप हो गए. प्रखर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को भी वर्षों बाद, ए वेड्नस्डे में अपने उपयुक्त भूमिका मिली है. अनुपम खेर जैसे विख्यात अभिनेता को भी इसी फिल्म में वर्षों बाद सृजनात्मक  आनंद मिला होगा, हालाकिं वे स्वयं 2005 में मैंने गाँधी को नहीं मारा इसी उद्देश्य के साथ बना चुके है.


आलोकनाथ जो बुनियाद से हमारे सामने आये थे, आज में घर घर खेली जैसी सीरियल से सरवाइव कर रहे है. एक बार बलराज साहनी ने कहा था कि मैं समाज बदलने फिल्मों में आया था, पर भूल गया था कि यहाँ बिज़नस मुख्य है. उद्देश्य ही व्यावसायिक है, तो उसमे सृजनात्मक कितनी बचेगी?


हालाँकि आज अमिताभ बच्चन हरेक प्रकार कि भूमिकाए कर रहे है लीकें यह मात्र उनका सौभाग्य है इंडस्ट्री का ट्रेंड नहीं.


रंगमंच एक सौभाग्यशाली संभावनापूर्ण माध्यम है जहाँ पहले दिन से ही बताया जाता है कि प्रत्येक बार भिन्न ढंग से भूमिका निभानी है इसके लिए समाज, जीवन-दर्शन, मनोविज्ञान का सहारा अन्य कला माध्यमों जैसे संगीत, पेंटिंग्स, कविता-साहित्य तो आधार है ही. यह अभिनेता का अधिक उर्वर-सृजनशील एवं प्रयोगवादी बनता है जो बने बनाये ढांचे को बार-बार तोड़ कर उसमे से एक नया ढांचा बनाता है. दर्शक चरित्र चित्रण और अभिनय का अस्वाद लेते है. स्तर कि प्रतीक्षा नहीं करते इसलिए नाट्य शास्त्र में कहा गया है कि प्रेक्षक को सुविचारित, संस्कारित, उदार, ग्रहणशील व्यक्ति होना चाहिए, वाही सच्चा दर्शक है, आज ऑडिएंस नहीं. जहाँ दर्शक के लिए ऐसा संस्कार वांछनीय हो वहां अभिनय-अभिनेता का स्थान कितना ऊँचा है. अपने में ही स्पष्ट है. कालिदास से गोर्की, चेखव से ब्रेख्त, सान्त्र से मोहन राकेश, धर्मवीर भारती आर्थर मिलर से लेकर धामू से रेखांकित करते है कि अभिनेता का जीवन रंगमच है, वहीँ अन्य माध्यमो में उसकी आकाल मृत्यु हो जाती है. 

अमिताभ आप औरों से अलग है



विभिन्न किरदारों को विशेष रूप से जटिल चरित्रों को निभाना
किसी भी माध्यम के अभिनेता के लिए एक कठिन चुनौती होता है ..
इस दृष्टि से " ब्लैक " के बाद " पा "
आपके अभिनव,अप्रतिम प्रयासों में से एक है..
मुजे व्यक्तिगत रूप से ऐसा लगता है कि एक अभिनेता के रूप में आप अधिक स्वतंत्र एवं प्रयोगवादी भूमिकाएं अब कर पा रहे है
जो अतुलनीय है..
हालाकि अपने युवा स्टारडम में आपने जो सफलता हासिल की उसमे एंग्रीयंगमैन इमेज के बाहर सफलता नहीं मिली ...
आपने "आलाप" ,"मिली " में अद्भुत अभिनय किया परन्तु वाही इमेज का चक्कर..
परन्तु अब आप डाकू, जिन्न कि भूमिकाएं भी मजे से निभा रहे है ..
एक अभिनेता के रूप में आप चरम आनंद ले रहे है ..
अवश्य ही आपके लिए भी ये अदभुत है साथ ही मुझ जैसे दर्शक जो आपको अपने कॉलेज
और नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के दिनों में सिल्वर स्क्रीन पर राज करते देख रहे है, के लिए अपने आदर्श अभिनेता को प्रयोगवादी जोखिम उठाते देख क्रिएटिव प्लेजर ले रहे है..
मेरी व्यक्तिगत इच्छा है कि शेक्सपीयर के "हेनरी द फोर्ड" पर आप कार्य करे तो एक और सोपान दर्शको के समक्ष आएगा
हालांकि मै यह नहीं जानता कि कमशियर्ली यह प्रस्ताव कितना कारगर हो सकता है..
बांग्ला रंगमंच के प्रख्यात कलाकार "गिरीश घोष"  के ऊपर भी आप अदभुत भूमिका निभा सकते है
जिनका अभिनय देखने रामकृष्ण परमहंस आया करते थे..


आप स्वस्थ और सक्रिय रहे
इसी शुभकामना के साथ
  आलोक चटर्जी 
     स्नातक
नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा
पता: H.I.G 101 नर्मदा अपार्टमेन्ट, सेक्टर बी ,सर्वधर्म कालोनी.कोलार रोड,भोपाल(म.प्र.)

राहुल है सच्ची दीवार






राहुल द्रविड़ एक शांत गंभीर शर्मीले व्यक्ति है,
लेकिन क्रिकेट के मैदान में वे एक अभेद दीवार है..
जिन्हें भेदना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों के लिए एक कठिन चुनौती है ..
सात माह बाद न्यूजीलैंड दौरे के पश्चात् कल उन्होंने सत्ताईसवां टेस्ट शतक जमाया,
वो भी ३२ पर चार विकेट गिरने के बाद दृश्यता और संकल्प को दर्शाता है ..
साथ ही वे ग्यारह हजारी रन बनाने वाले विश्व क्रिकेट के पांचवे बल्लेबाज बन गए है ..
वे इसी तरह देश कि सेवा करते रहे ....
इसी कामना के साथ द्रविड़ को सारे देशवासियों के साथ मेरी भी बधाई...

Saturday, 14 November 2009






आज एक आवाज़ सुनी 
वो आवाज़ कभी मेरे लिए भी गाती थी


कोई गीत उसने मेरे लिए गाया था 
कोई एक नाम भी उसने दिया था मुझे 


वो गीत गुम गया है 
वो नाम कहीं खो गया है 


आज फिर उस आवाज़ में 
उस पुराने क्षण को महसूस किया मैंने 
अतीत की धुंध में खो गया मैं 


संबंधों के मकड़जाल ने 
कहीं रिश्ते को जकड लिया


अब एक गहरी उदासी भरी 
शाम है 


इन्तजार करती आँखें 
और कान हैं 


एक अनवरत दारुष प्रतीक्षा है....

(१४ नव.०९ दोपहर २:४७)

बाल दिवस








आज बाल दिवस पर विश्व के सभी बच्चो को हार्दिक शुभकामनाये और बधाई...
वे  ही भविष्य है समाज के आगामी निर्माता और नियंत्रक हैं
वे ही हमारी समूची मानवता के सच्चे उत्तराधिकारी हैं...


पर आज हमें अपने से ये भी पूछना चाहिए की आखिर किस प्रकार की दुनिया हम उनके लिए छोडेंगे 
ग्लोबल वार्मिंग,आण्विक हथियार,वैश्विक आतंकवाद और भौतिकतावादी अंधी दौड़ से भरी कौन सी दुनिया 
उनका क्या भला करेगी...


आज बाल दिवस पर हमें ये भी सोचना चाहियें की स्कूल आज यातनागृहों में बदल रहें है 
जहाँ बच्चे रट्टू तोतों की तरह पाठ पढ़ रहें है समझ तो पता नहीं क्या रहें हैं ?
क्योंकि समझानेवाला शिक्षक ही माडलों जैसे निर्दयी रिंगमास्टर में बदल गए हैं ...
कविता की जगह जिंगल ने और कहानी की जगह अश्लील सन्देश लेते जा रहे हैं...
ऐसे समाज में हमें बच्चों को सच्ची खुशी, मुस्कराहट, देखभाल और संस्कार देना चाहियें ..
साथ  ही कोशिश करनी चाहिये कि सबसे कीमती चीज बची रहें जो है
मासूमियत...
जिसे बच्चे अनजाने ही खोते जा रहे हैं..

बच्चो....
हम सभी बड़ों को माफ़ करना...
हम बडें ही इअसके लिए जिम्मेदार हैं...

तुम्हारी  जिंदगी में 
हंसी..
कविता..
परियां..
तितली..
रंग..
हमेशा मौजूद रहें....


हैप्पी बाल दिवस.......


आपका दोस्त आलोक चटर्जी ....

(१४ नव. दोपहर २:३८ )


Thursday, 12 November 2009

क्या मै स्वयं को जानता हूँ ?




क्या मै स्वयं को जानता हूँ ?
नहीं...
क्या जानने की कोशिश करता हूँ ?
हां...
तो क्या पाया ?
यही कि कुछ है ही नहीं कहने को,
कुछ है ही नहीं पाने को...
कुछ पाया सब पड़ा रह जाता है यहीं
हमारे देहान्तर के बाद...

(१३ नव.प्रातः ११:१०)

जीवन









जीवन स्वयं प्रवाहमान है...
समय कि भांति..
उसे पकड़ने कि कोशिश नहीं करना चाहिए.
स्वयं को प्रवाह में समर्पित कर देना चाहिए..
बहने देना चाहिए......


(१३ नव.प्रातः ११:०५ )

जीवन के रंग



आज का दिन भावनाओ से उथल-पुथल भरा दिन है..
आज मेरे बेटे का जन्मदिन है
और वो दूर बडोदरा में है
अभी घर पर सचिन,राज(दोस्त संस्था के रंगकर्मी) और शम्मी (सनी के बचपन का दोस्त)
घर पर केक लेकर आये और हम सबने केक काटकर खाया,
फोन ऑन रखा था,और सनी सेव संवाद हो रहा था
एक अद्भुत,सघन और भावुक क्षण था ..
दूसरी ओरआज से तीन साल पहले आज ही के दिन शाम छह बजे मैंने अपनी माँ को खो दिया था..
एक ओर मेरे बेटे को जन्मदिन कि बधाई
और दूसरी ओर ईश्वर से माँ कि मुक्ति के लिए प्रार्थना..
और इसके बीच में एक पिता और बेटे कि भूमिका में
मै....
और दिन भर विद्यार्थियों,बच्चो,रंगकर्मियों के साथ काम करता
मै....
अपने को देह और कल से मुक्त होता पता हूँ...
जीवन कितना दिलचस्प और रंगों से भरा हुआ है.....
और दो चटख विरोधी भावनाओ के रंग एक साथ,
एक ही दिन,
एक ही क्षण..
उपस्थित होते है .....
इस अद्भुत जीवन को प्रणाम.....


प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में
आपका दोस्त आलोक
(12 नव.सायं ०८:०५)

तुम्हारे जन्मदिन पर



तुम्हारे जन्मदिन पर नहीं लिख सकता कोई कविता
दोनों हाथ उठाकर,ईश्वर से करता हूँ प्रार्थना
तुम सफल, यशस्वी, पराक्रमी बनो,
निर्भय बनो,
जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करो तुम
मानवता का करुणा का सागर का लहराता रहें भीतर हमेशा तुम्हारे
कोई सीख, आदेश नहीं दे सकता मै तुम्हें
बल्कि तुमने ही बार-बार निर्देशित किया है मुझे
इक सपना हो तुम मेरा,
जो रूप धर आया है मेरे जीवन कि बगिया में
सनी मै तुम पर कोई कविता नहीं लिख सकता
क्योंकि तुम मेरी सबसे अच्छी कविता हो....
तुम्हारा डैडू....
सायं ७:५० मै मेरे ड्राइंग रूम में





Sunday, 8 November 2009

अलग सुबह



सुबह अंधेर 5:45
सड़क किनारे अलाव तापते कुछ ऑटो वाले प्रतीक्षा कर रहे है, पहले ग्राहक की.
जिससे शुरू हो रोजी रोटी का एक और दिन
सफाईवाली स्त्रियाँ मुंह पर कपडा लपेट झाडू लगाने के पहले
सुड़क रही है चाय खुद को सर्दीली सुबह में गर्म करने के लिए
छोटे बच्चे साइकिलों पर पेपर बाँट रहे है
और देख रहे है उन बच्चो को
जो तैयार होकर माँ के साथ स्टाप पर
स्कूल बस की प्रतीक्षा कर रहे है.
वे अपने बचपन को देख रहे है लाचार
और पहुंचा रहे है हमारे आपके यहाँ ताजा अखबार
कुछ महिलाये अपनी चर्बी कम करने Morning Walk पर जाती है.
पर जारी है वहां पर भी सास देवर ननद की बातें
एक पचपन साल का व्यक्ति बगीचे में योग करता है खुद को फिट रखने के लिए
कुछ वृद्ध जीवन को रंगों से भरने निरर्थक लगाते है हास्य क्लब का ठहाका
घरों में चाय के बर्तन खड़कने की आवाजें है. कहीं पूजा के मंत्र स्वर है.
कुछ फूल तोड़ने बेचने वाले भी है
दूध के पैकेट बांटता लड़का है.
बर्तन साफ करने वाली महरी है.
जो तेज जाती है काम पर क्योंकि आठ बजे तक उसे घर लौटना है.
आदमी का खाना बनाने,
बच्चो को दूध पिलाने,
यूँ होती है हर सुबह हमारे आपके आस पास
इसकी खदबदाहटों, गुनगुनाहटों, सरसराहटों
को क्या हम देख-सुन रहे है....?

Thursday, 5 November 2009

स्तानिस्लाव्स्की


स्तानिस्लाव्स्की यथार्थवादी अभिनय की खोज में बहुत बेचैन रहते थे.
अपने आदर्श और मूल्यों को प्राप्त करने के लिए वे किसी भी सीमा तक जाते थे.
ग्रीक नाटक का मंचन करने के लिए वे अपने समूचे अभिनेताओं को एथेंस ले गए थे
और वही एक महीने  रिहर्सल कराई थी,
तो वही गोर्की के नाटक Lower Depth में अपराधी, गरीब और झुग्गीवासियों के जीवन दिखाने
उन्होंने अपने अभिनेताओं को कई दिनों तक वास्तविक रूप से
उन्ही इलाकों में जाकर रहने को कहा था
ताकि अभिनेता उनके जीवन को करीब से देख सकें, महसूस कर सकें.
जीवन के बाद के वर्षों में भरतमुनि का नाट्यशास्त्र पड़ने से
उनकी सोच में आमूल-चूल परिवर्तन भी आया.
Anton Chekhov के Cherry Orchard को सात्विक अभिनय की तलाश में
उन्हें Musical Form में भी करते देखा गया.
नुक्कड़ नाटक हो,
संस्कृत नाटक हो
या यथार्थवादी
किसी भी प्रकार के नाटको में उनकी अभिनय पद्धति हमेशा काम आती है.
एक अर्थो में वे आधुनिक विश्व रंगमंच के पितामह है.
 ऐसे मनीषी और पितामह को शत्-शत् प्रणाम...

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में, आपका दोस्त आलोक

सत्रह हजारी तेंदुलकर


विश्व क्रिकेट के इतिहास में एक स्वर्णिम क्षण जुडा
जब सचिन ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक दिवसीय क्रिकेट में विश्व का पहला ऐसा बल्लेबाज़ होने का गौरव प्राप्त किया है
जिसे छूना किसी अन्य खिलाडी के लिए बहुत दूर कि बात है.

जैसा कमेंट्री करते हुए गावस्कर ने टिपण्णी की
कि तेंदुलकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटरों में अब तक के सबसे चमकदार सितारे हैं.
लिटिल मास्टर का लिटिल ब्लास्टर को ये सम्मान अपने आप में तेंदुलकर कि उपलब्धि दर्शाता है.
विश्व के करोडो प्रशंशको की भांति मैं भी सचिन को बधाई देता हूँ.
वे करोडो भारतीयों के आदर्श है.
निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन में उन्होंने हमेशा शालीनता दिखाई है.
उनकी दीर्घायु और उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाये.

Wednesday, 4 November 2009

Todays thought..!





        






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कौन हो तुम मेरे?


कौन हो तुम मेरे?
कैसे कहूँ?
बस यूँ कहूं ...
जैसे जड़ है आधार वृक्ष का ...
मनुष्य टिका है भावनाओ की ऊष्मा पर ...
जैसे फल से चिपका हुआ होता है छिलका...
शरीर से चमड़ी ...
जैसे रौशनी हो आँखों की  ...
झरना हो सृजन का ...
निर्बाध प्रवाह हो ...
तुम सब हो, सब कुछ हो ...
भावना का आवेग हो ...
अनुभूति की सच्चाई हो...
अनुभव की खान हो...
गुणों का रूपाकार हो ...
गहरे काले अंधियारे में ...
चमकते भोर के तारे हो तुम...
पंछी की चहचाहट हो ...


सुबह का गान हो ...
अरुण की लालिमा हो, चाँद की चांदनी हो ...
भटके हुए के लिए दिशा प्रदर्शक हो तुम...
वृक्ष में रची छाल हो तुम ...




कैसे कहूं?
तुम मेरे कौन हो ...
बस यूँ ही कहूं कि ...

Tuesday, 3 November 2009

रंगमंच क्या है?


रंगमंच क्या है? पीटर ब्रूक के शब्दों में, "ये EMPTY SPACE में पैदा होता है| EMPTYNESS ही स्पेस को जादुई बनाता है|" यहाँ जीवन की भावनाओं के गहरे रंग दिखाई देते हैं, महसूस होते हैं और हमें कहीं भीतर से सोचने को मजबूर करते हैं| क्यूँ नहीं बनता कोई इंजीनियर, डॉक्टर, वक़ील, बिज़नेस मैन या फिर कुछ और? क्यूँ सुनता है वो इस रंगमंच की दुनिया को? सिर्फ इसलिए कि यहाँ देश, देह और काल से मुक्ति मिलाती है| नहीं होतीं जटिल गुत्थियाँ दफ़्तरों की| बाज़ार का मोलभाव नहीं होता और न होते हैं कोई अभाव| होती हैं आँखों में सपनीली परछाइयाँ सृजन की| वन-वन भटकते हुए राम हम ही होते हैं| लंका में दहाड़ते रावण हम ही हैं| कंस के कारागार में पैदा होते कृष्ण हम हैं; तूफानों में भटकते किंग लीयर हम ही हैं| भावनाओं के झंझावात में फँसकर भ्रमित होने वाले हैमलेट भी हम ही हैं| इसलिए चुनते हैं हम रंगमंच की दुनिया को; क्योंकि ये एक जादुई दुनिया है!
प्रतिक्रया की प्रतीक्षा में आपका दोस्त आलोक!

Monday, 2 November 2009

गुरुनानकजी का प्रकाशपर्व!



आज गुरुनानकजी का प्रकाशपर्व है! उनके जन्मदिन पर लेव तोल्स्तोय की एक बात याद आती है, जो ५०० वर्ष पहले गुरुनानक ने कही थी, "बुराई के पास जाने से बुराई बढ़ती है|" इससे सम्बंधित नानक का प्रवचन याद आया और याद आया कि गांधीजी ने तोल्स्तोय से प्रेरणा ली थी| तोल्स्तोय पर बुद्ध का गहरा असर था| सारे अच्छे और महान लोग एक ही बात कहते हैं; क्योंकि सत्य एक है, सहज है, सुन्दर है! तथास्तु!!
आपका दोस्त आलोक

SRK जन्मदिन!

आज शाहरुख़ ४४ वर्ष के हो गए| उनको हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई! वे ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने रंगमंच से शुरूआत कर दूरदर्शन और फिर फिल्मों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया| बिना किसी GOD FATHER के उन्होंने अपना मुक़ाम हासिल किया| आज भी वे अपने थियेटर गुरु "बैरी जौन" को बहुत सम्मान से याद करते हैं| कई शारीरिक चोटों और बीमारियों के बाद भी उनकी ऊर्जा युवाओं जैसी है| वे स्वस्थ रहे और दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करते रहें; यही कामना है! HAPPY BIRTHDAY!!
आपका दोस्त आलोक चटर्जी

Wednesday, 28 October 2009

कला जीवन के लिए या जीवन कला के लिए है!

"जीवन जीने की कला ही सबसे बड़ी कला है| सारी कलाएँ उस कला को समृद्ध करने के लिए हैं, जिसे हम जीने की कला कहते हैं|"
                    जब प्रख्यात नाटककार, निर्देशक बर्तोल्त ब्रेख्त ने जब यह कहा था तो वे दरअसल कला जीवन के लिए या जीवन कला के लिए है; के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे| 'आर्ट फॉर आर्ट सेक' का क्या अर्थ है? जब तक वह समाज, लोगों और उनकी महत्त्वाकांक्षा, सपनों, संघर्षों को प्रतिबिंबित नहीं करती; वह एक मानसिक अय्याशी ही है|
                     हमारे यहाँ कला फिल्में कभी भी उन दर्शकों तक नहीं पहुँची, जिनके लिए वे बनायी गयी थीं या जिनकी ज़िन्दगी को व्याख्यायित करती थीं| इसी कारण तमाम बुद्धिजीवी आग्रहों, प्रशंसा, पुरस्कार के बाद भी वे अवाम या आमजन की फिल्में कभी नहीं बन पायीं| कई फिल्में प्रदर्शित ही नहीं हुईं और कुछेक सुबह के शो में एक सप्ताह चलीं| अंत में वही हुआ जो अपेक्षित था| कला एवं समानांतर फिल्मों के सभी दिग्गज श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलाणी, केतन मेहता, नसीर भाई, ओमपुरी, पंकज कपूर, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, कुलभूषण खरबंदा सभी बाद में मुम्बइया आम फिल्मों की भीड़ का हिस्सा बने| यहाँ भी वो सफल रहे पर 'वो आग' नहीं दिखी जो तब थी| न ही वे मुम्बइया फिल्म इंडस्ट्री की भेड़चाल को बदल सके|
                     आज कारपोरेट जगत के दखल ने सृजन की सारी संभावनाओं को समाप्त नहीं किया, परन्तु धुंधला अवश्य किया है| और बाज़ारोन्मुखी शक्तियों के आर्थिक जाल ने प्रतिभा को अपना गुलाम बना लिया है| मुम्बइया फिल्मों में इन दिनों बड़े प्रयोग हो रहे हैं, परन्तु वे प्रतिशत में कितने हैं? उनकी सफलता का प्रतिशत क्या है? दरअसल, बड़े सितारों द्वारा शासित और पूँजीपतियों के नियंत्रण ने बाज़ार पर एकाधिकार कर रखा है| परन्तु, फिर भी आमजन इन फिल्मों को देखने बड़ी संख्या में इसीलिये जाता है क्योंकि वहाँ वो अपने सपनों को देखता है; जीवन के यथार्थ से क्षणिक पलायन का सुख लेता है और अंत में बुराई पर अच्छाई की विजय देख स्वयं को विजेता मान, सिनेमाघर से निकलता है| कल्पना का मरहम यथार्थ के मवाद पर भारी पड़ जाता है!
-आपका दोस्त आलोक चटर्जी

खुद से सवाल पूछना|

ख़ुद से सवाल पूछना
सबसे बड़ा सवाल है
कला है
ख़ुद को समझना
दूसरों को समझाते-समझाते
हम रह जाते हैं, अज्ञात
स्वयं से|
 # # # # # # # #

Tuesday, 27 October 2009

स्मृति!

क्या है स्मृति?
या जिसे कहते हैं, याद
वह क्या है?
भावनाओं की गुत्थी?
अनुभूत किये गए, कुछ क्षण
कोई सुखद या दुखद बात
क्या है, स्मृति?
क्यों दोहराते हैं, स्मृतियों को
स्मृत करते हुए,
हो जाती है, विस्मृत एक दिन,
स्मृतियाँ!
बची रहती है केवल,
प्याज की भीतर की,
परतों की परतों का,
शेष रह जाता है, हथेली पर
खालीपन;
हथेली पर बैठे, स्वप्न-सा!

लिखना क्यों ज़रूरी है?

लिखना क्यों ज़रूरी है? क्या खुद को अभिव्यक्त करने के लिए? ये बतलाने के लिए कि हमें कितना पता है या ये जतलाने के लिए कि हम कितना जानते हैं? वह एक क्षण जब व्यक्ति स्वयं को रोक नहीं पाता| एक हूक-सी उठाती है कि अब रहा नहीं जाएगा| तब जो भीतर है; वह बाहर उमड़ आता है| तब, कब शब्द, कहाँ से झरने लगते हैं; यह स्वयं को भी नहीं पता होता| कहें तो एक प्रेरणा-सी उमड़ती है| चाहे तो उसे ईश्वरीय कहें या माता-पिता का आशीर्वाद कहें| सब सहज एवं स्वमेव घटित होता-जाता है| मुझे लगता है, हममें से हर एक के अन्दर एक लेखक, एक कवि सोया पड़ा है| जब वह जागे, तभी सवेरा! सभी के जीवन में सृजन का यह सवेरा जल्दी आये, यही कामना है|
प्रतिक्रया की प्रतीक्षा में आपका दोस्त आलोक चटर्जी!

Monday, 26 October 2009

ओ! मस्तक विराट!

ओ! मस्तक विराट!
अभी नहीं मुकुट,
अभी नहीं अलंकार!
अभी नहीं तिलक,
अभी नहीं राज्य-भार!
एक दिन माथे मेरे,
सूर्य होगा उदीय,
इतना पर्याप्त  मुझे  अभी!
-कुंअर नारायण सिंह

"एक्टिंग इज इटरनल जर्नी  टु नो  द इन्टरनल वर्ल्ड ऑफ़ एन ऐक्टर." -मर्लिन ब्रांडो

aankhein!

कल मैंने देखा बहुत-सी आँखों को,
वे आँखें सपनों से भरी थीं,
उन सपनों में फैला था, एक विराट आकाश!
उन आँखों में थी ललक पढ़ने की,
अभिलाषा थी जीने की,
उमंग थी, दुनिया के लिए!
पर, उनके हाथ देखे मैंने कचरा बटोरते,
जूठे बर्तन साफ़ करते|
वे हाथ थे, ईंटों को लेकर चलते,
जिस पर बैठा, फिरंगी साहब मुस्कराता!
मैंने देखा उन हाथों को बूढ़े पिता को खाना खिलाते,
लाचार माँ को दवा पिलाते!
कभी-कभी फुरसत के वक़्त,
हमउम्रों के साथ बतियाते,
कितने व्यस्त हैं हाथ उनके,
कितनी सपनीली हैं उनकी आँखें!
वे आँखें हैं हमारे समाज के,
ग़रीब भूखे, पर कामगार बच्चों की!
उन आँखों में बड़ी आशा है,
क्या हमारे पास कुछ वक़्त है, उन्हें देने के लिए?


आपका चिंतनशील दोस्त; आलोक चटर्जी

Sunday, 25 October 2009

raajneeti aur kalaa!!



आज जितनी राजनीति कला की दुनिया में है; उतनी राजनीति राजनीतिक दुनिया में भी नहीं है| साहित्यकार खेमों में बँटे हैं; तो नर्तक घरानों में| गायक अपने गुरु से बाहर नहीं आ पाते और रंगकर्मी तीन नाटक और दो कार्यशाला के बाद सरकारी अनुदान के लिए संस्था बना लेते हैं| "भोपाल" रंगमंच की दुनिया में, मुनाफाखोरी में अव्वल है| आये दिन होने वाले सरकारी आयोजनों में दर्शक मुफ़्त में कार्यक्रम देखता है और स्वयं को "कलारसिक" मानने का भ्रम पाल लेता है| युवा लड़कियों को भ्रम है कि दूरदर्शन में चेहरा दिखाने से वे एन्जिलिना जोली जैसी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर लेंगी| युवा निर्देशक निर्देशन कला पर कोई किताब नहीं पढ़ते| शहर में होने वाले नाटकों में से कुछ को चुनकर नाट्य समारोह करना और लाखों का अनुदान प्राप्त कर लेना यहाँ का शगल है| जबकि आज युवा रंगकर्मी रेडियो, वीडियो, टी व्ही, फिल्म और रंगमंच, सभी जगह सम्मानजनक स्थान पा रहा है और उन्हें भरपूर काम भी मिल रहा है| पर, कलाकार की वो गरिमा कहाँ गयी? सत्ताधीशों के सामने हैं-हैं करने वाला, समाज को किस प्रकार की  नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला है? वह कितना संवेदनशील है, संस्कारित है और कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए व्याकुल है; यह एक यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर कलाकारों को ही ढूँढना है| सभी कलाकारों को स्वयं इसका रास्ता खोजना ही होगा| रविवार की सुबह कला की दुनिया में एक नया सूर्य उगे; यही अभीष्ट है!
अस्तु!!
आपका अपना दोस्त आलोक चटर्जी

Thursday, 22 October 2009


कलाकार  की जाति, पंथ और धर्म एक ही है; इंसानियत, मानवता, सह्रदयता! कलाकार का ह्रदय उदार और संवेदनशील होना चाहिए! एक कलाकार को निष्णात पारखी भी होना चाहिए! दरअसल, वो यथार्थ और समाज के बीच "फिल्टर" का काम करता है! वह एक ऐसा शीशा है, जिसके प्रतिबिम्ब में व्यक्ति स्वयं को और समाज को देख सकता है! परन्तु आज का कलाकार सत्ता-सुविधा भोगी हो गया है! बिना सरकारी अनुदान के उसका काम नहीं चल सकता और स्थानीय दूरदर्शन में चौखटा दिखाए बगैर उसकी महत्त्वाकांक्षा की तृप्ति नहीं होती! विचारणीय प्रश्न है, क्या ऐसे कलाकार कला और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे हैं?
आपका अपना "दोस्त" आलोक चटर्जी 

Wednesday, 21 October 2009

भाईदूज!

कल भाईदूज का दिन था. दो मौके ऐसे होते हैं, जब मेरी कलाइयाँ सूनी होती हैं. एक राखी का अवसर और दूसरा भाईदूज का. दोनों ही मौंकों पर, एक उदासी और सूनापन लगता है. ये मुझे बचपन की यादों में ले जाता है, जब मैं ख़ुद ही अपने हाथों पर ढेर सारी राखियाँ बाँध लेता था और ख़ुद ही खुश हो लेता था. अब दूसरों को, उत्साह के साथ त्यौहार मनाते देख, मन खुश हो जाता है. लगता है कि मैं भी उसमें शामिल हूँ. कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं:

गगन से दूर क्या है?

क्षितिज के पार क्या है?

क्या है, सागर की अतल गहराइयों में?

हिमालय के शिखरों पर क्या है?

क्या है, अतृप्त मन की कामना?

जीवन का चरम लक्ष्य क्या है?

सभी ब्लौगर्स को शुभकामनायें !! आपका dost आलोक चटर्जी

Thursday, 15 October 2009

प्यारे सनी!


प्यारे सनी!

तुम्हें पता नहीं, लेकिन मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि जिस दिन तुम पैदा हुए यानी १३ नवम्बर; डॉक्टर स्वामी के अस्पताल में, बेचैन घूम रहा था; सिजेरियन केस था, इसलिए मुझे याद है सनी, सुबह ७ बजे "पाश" की कवितायें पढ़ रहा था, "मैं तो घास हूँ, आपके किए-धरे पर फिर उगा हूँ", ७:२७ पर डॉक्टर ने सूचित किया, "सँभालिये अपने पहलवान को" मुझे याद है कि तुम हरे रंग की ट्रे में पड़े थे और तुम्हारी तब तक नाल भी नहीं काटी गई थी तुम मुस्करा रहे थे तुम्हारा रंग बहुत गोरा था, पाँव गुलाबी थे ये चित्र मेरी आँखों से मिट नहीं सकता न मुझे इसे याद करने की आवश्यकता है ये तो बस है!

तुम्हें तुम्हारे स्वर्णिम भविष्य हेतु शुभकामनाएँ! कार्यक्षेत्र में पराक्रमी बनो!!


दोनों बाँहों में तुम्हारे लिए असीमित प्यार लिए तुम्हारा पिता!!!

आज का विचार!


"साहित्य और दर्शन का अध्ययन हमें वास्तव में शिक्षित बनाता है अध्ययन से, नैतिकता-अनैतिकता, सच-झूठ और पाप-पुण्य अपनी नई व्याख्याओं के साथ प्रकट होते हैं अतएव, सत्यनिष्ठा, सत्यसंधान और सत्याग्रही होना एक कलाकार का चरम उद्देश्य होना चाहिए!"

-आपका दोस्त आलोक चटर्जी

Wednesday, 14 October 2009

शंखनाद!

ये वादा और किसी से नहीं,
तुझसे है,
खुदी से मिलेगा खुदा,
ऐसे कुछ काम कर जाएँ दुनियाँ में,
बन जाएँ अपने नाखुदा!
lllllll
बहुत-बहुत गहरी
बहुत-बहुत चंचल
बहुत ख़ाली
बहुत भरी हुई
भावना के चरम आवेग में डूबी हैं,
तुम्हारी आँखें!
lllllllll
ख़ुद को जानना, दूसरे को जानना है,
दूसरे को जानना
दरअसल,
ख़ुद को ही जानना है,
जानने-पहचानने की इस प्रक्रिया में,
विस्मृत कर देना है,
"मैं", "तुम", "वो", "हम", "वे"
सारे रूपाकार संबोधन संज्ञाएँ,
हो जाएँ "एकाकार"!
lllllll
-आपका दोस्त आलोक चटर्जी
१४ अक्टूबर २००९