स्फूर्ति, ऊर्जा, सकारात्मक सोच का मिश्रण ही जीवन को सुन्दर बनता है.
किसी क्रिएटिव इंसान के लिए ज़रूरी है कि वो अपने ऊपर संतुष्टि कि जंग कभी न लगने दे.
2009 समाप्त होने को है तो मैने 2010 के लिए नया कुछ करने की सोची है.
बांग्ला और मराठी में पाठ परम्परा काफी पहले से उपस्थित है.
बांग्ला में तो नाटकों का पाठ सुनने का भी टिकट खरीदकर लोग आते है.
लेकिन हिंदी में पाठ का अर्थ कवि सम्मलेन है जहाँ कुछ लोग अपनी कविताये पढ़ते है.
दरअसल शब्दों की मूल ध्वनि को पकड़ना, ध्वनि में छिपे अर्थ को उदघटित करना और
व्याख्यात्मक बिम्ब उत्पन्न करना, ये सब पाठ परंपरा की अनुस्युत और छिपे संस्पर्श है.शब्दों का सही उच्चारण हमें उसमे छुपे भावनात्मक आवेग Emotional Force को पकड़ने में मदद करता है.
और रचना का सही पाठ एक निश्चित देह्गति और देहभाषा को भी प्रकट करता है.
चेहरे का सही भाव,भाषा,देह्गति मिलकर एक पूर्ण अर्थ को प्रकट ही नहीं करते वरन संप्रेषित भी करते है.
यह पूर्ण व्यक्तित्व निर्माण है..
इसीलिए सोचा प्रत्येक शनिवार में कुछ निश्चित श्रोता, दर्शक के सामने हिंदी में कविता, कहानी,नाट्य गीत, नाट्य संवाद पर पाठ प्रस्तुत करूं.
युवा पीढ़ी के लिए यह साहित्य, नाटक, कविता से साक्षात्कार के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास से भी इसे जोड़ा जाएगा..
राकेश दीक्षित,राजेंद्र कोठारी और मैंने एक दोपहर new market कॉफ़ी हाउस में बैठकर
भोपाल नगर निगम की चुनाव चर्चा के बीच यह तय किया कि
भोपाल में जितने प्राइवेट शिक्षा संस्थान है उनके विद्यार्थियों को भी इसमें शामिल किया जाए..
कला जगत कि विशेषकर हिंदीभाषी पट्टी कि यह समस्या हमेशा रही है कि
दूसरो से संवाद न कर अपनी ही दुनिया में उलझे रहते है ..
समाज-समाज कि बातें तो बहुत करते है परन्तु समाज से जुड़ते कितना है..
नए दर्शक भी हम नहीं तलाशते बस जो भारत भवन, रवींद्र भवन आता है वही हमारा दर्शक है..
क्योकि नहीं रंगमंच समाज के हर कोने तक पहुँचता हैं ,यह अपने श्रेष्ठ होने के अहंकार मैं मेंढक सा कुए में घुसे रहता है..
और दिखने वाले आसमान को ही अपनी दुनिया मानता समझता है..
होश मैं रहकर गाफिल रहना कोई हम रंगकर्मियों से सीखे
हम युवा पीढ़ी को संस्कारित करने और कलाक्षेत्र में लाने के लिए क्या कर रहे है ..
फिल्म और टेलीविजन ने थियेटर को ख़त्म कर दिया है.
दर्शक छीन लिए ऐसी घोषणा करने से रंगमंच का कोई भला नहीं होने वाला.
अच्छी फिल्म और टीवी के सामने हमारी तैयारी क्या है.
नए दर्शक आयें और नियमित रूप से जुड़े. ऐसी कौन सी योजना या ब्लू प्रिंट रंगकर्मियों के पास है.
प्रडक्शन ग्रांट से नाटक कर लेने से खुद का बायोडाटा ज़रूर बनता है
पर युवा रंगकर्मी के लिए शोध, प्रशिक्षण, पुस्तकालय, पत्रिका, डायरेक्ट्री
जैसी सुविधाओ के लिए हमेशा सरकारी मदद या ग्रांट कि अपेक्षा होती है.
पर स्वयं कि कार्यप्रणाली क्या हो यह भी विचारनीय है.
बहरहाल 15 दिसंबर वैशाली काम्प्लेक्स शाम 6.30 पर आये
आपको निराला, मुक्तिबोध, बच्चन, रघुवीर सहाय और अज्ञेय कि कविताओं का रसास्वाद मिलेगा.
परिपत्र में
दोस्त आलोक
10.29AM























